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प्रदेश का एकमात्र सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल खुद ही बीमार

Fri, 15 Jan 2016 01:13 AM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, कुरुक्षेत्र
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100 बेड का अस्पताल, जहां दवाएं नहीं सिर्फ उम्मीद पर ही इलाज होता है। इसी उम्मीद पर डॉक्टर टिके हैं तो इसी पर आयुर्वेद की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों से लेकर कुछ मरीज दिल थामे हुए हैं। अधिकतर मरीजों ने आयुर्वेद से मुंह ही मोड़ लिया है। यह हाल है प्रदेश के एकमात्र श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक कालेज एवं अस्पताल का जो प्रदेश सरकार द्वारा आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए जनता के बीच किए जा रहे दावों की पोल खोल रहा है। अस्पताल मरीजो का ईलाज तो दूर खुद के ही ईलाज के लिए तरस रहा है, जिसके आगे यहां पर तैनात डॉक्टर भी मजबूर हो रहे हैं। करीब 5 माह पहले राज्य स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज भी यहां का दौरा कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी हालात नहीं बदले हैं।
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ऐसा भी नहीं कि कालेज एवं अस्पताल प्रबंधन ने विभाग के उच्च अधिकारियों को इस समस्या से अवगत नहीं करवाया हो, अस्पताल प्रशासन लगातार विभाग के उच्च अधिकारियों को इस समस्या से अवगत करवाता रहा है। जिसके बावजूद प्रबंधन की ओर से की गई मांग के अनुसार यहां जनवरी 2014 में दवाएं विभाग द्वारा भेजी गई थी। इसके बाद विभाग ने गंभीरता से नहीं लिया है और शायद यही कारण है कि अस्पताल में आने वाले गंभीर मरीजों के लिए तो दूर आम मरीजों के लिए भी दवाएं नहीं है। डॉक्टर मरीजों को दवाइयों के लिए कुछ दिनों के लिए इंतजार करने के लिए कहने को तो मजबूर हैं ही साथ ही बाहर से दवाएं लाने की सलाह खुले रूप से दे रहे हैं। वर्ष भर से यहां दवाइयां न होने के चलते ओपीडी में एक तिहाई तक गिरावट आ चुकी है तो वहीं वार्ड भी मरीजों के इंतजार में धूल फांक रहे हैं। मरीजों को आयुर्वेदिक दवाएं न मिलने के चलते अब ऐलोपेथिक ईलाज की ओर उनका रूझान बढ़ने लगा है।

दवाइयां खरीदने पर अटका मामला
बताया जा रहा है कि पहले अस्पताल प्रबंधन ही अपनी मांग अनुसार विभाग की अनुमति के उपरांत खरीद करता था तो बीच में मुख्यालय ने खुद ही यह दवाएं खरीदकर यहां आपूर्ति करने को कहा। अब नई सरकार ने यह दवाएं खरीदने के लिए कार्पोरेशन को मंजूरी दी है जबकि पूर्व सरकार की नीति को खारिज कर दिया है।
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मूल दवाएं भी नहीं उपलब्ध
सौ बेड के अस्पताल में दशमूलारिष्ट, कुमारी आश्व, वाश काश्व, योग राज गुगल, सिंहनाद, विस्कार्न तेल, आरोग्य वर्धनी, चंद्रप्रभावटी, हिंगविस्टिक चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, सीतोप्लादी चूर्ण, तालीसादी चूर्ण जैसी दवाएं भी नहीं है, जो कि महिला रोग से लेकर आम खांसी जुकाम एवं दर्द में काम आने वाली दवाएं शामिल है। इसके अलावा भी कई गंभीर बीमारियों में काम आने वाली दवाएं भी नहीं है। डॉक्टर स्वयं स्वीकार कर रहे है कि दवाएं न होने से मरीज अस्पताल से दूर होने लगे हैं, जिसके चलते उन्हें दिन भर खाली ही बैठा रहना पड़ता है। आयुर्वेद अस्पताल एवं कालेज एक ही परिसर में स्थित हैं और यहां पढ़ने वाले सैकड़ों छात्रों की पढ़ाई कक्षा तक ही सिमटने लगी है, जबकि अस्पताल में मरीजों की संख्या लगातार कम होने के चलते उनकी पढ़ाई का हिस्सा बनी प्रेक्टिस भी प्रभावित हो रही है।

जिलाभर में 15 डिस्पेंसरी भी दवाओं के इंतजार में
शहर में स्थित जाट धर्मशाला में जहां एक होम्योपेथिक डिस्पेंसरी बनाई हुई तो वहीं 15 आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी भी विभिन्न गांवों में स्थापित की गई है, लेकिन यह डिस्पेंसरियां भी दवाओं की लंबे समय से बाट जोह रही है, लेकिन सिर्फ उम्मीद ही चली आ रही है।
बाजार से खरीदनी पड़ रहीं दवाएं
अस्पताल में उपचाराधीन गांव कलरी जागीर निवासी किरण चंद व उनकी पत्नी परवी देवी ने बताया कि वह पहले भी एक माह तक यहां बीमारी के चलते दाखिल रहे और अब दोबारा से भी वह 4 दिनों से यहां दाखिल है। लेकिन उन्हें यहां से दवाएं नहीं मिल रही है। उन्हें बाहर से दवाएं खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है। वह बेहद गरीब है और इतनी दवाएं बाहर से खरीदने में समक्ष भी नहीं है। अब डाक्टरों ने उन्हें कहा कि 15 फरवरी तक दवाएं आने की उम्मीद है। यहीं पर लंबा ईलाज करवा रहे गांव बांबरेहड़ी जिला करनाल निवासी सत्यावान ने भी कहा कि यहां दवाओं का अकाल पड़ा हुआ है। मरीजों को बाहर से दवाएं लेने को मजबूर होना पड़ रहा है।

विभाग को लिखे है कई पत्र : छिक्कारा
कॉलेज एवं अस्पताल प्रिसिंपल डॉ. वीवी छिक्कारा ने बताया कि विभाग को उन्होंने कई बार पत्र भेजे हैं। लगभग एक माह पहले भी पत्र भेजा था तो वहीं बुधवार को भी एक रिमाइंडर भेजा है। उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही दवाइयों की आपूर्ति यहां आ जाएगी।
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