महामंडलेश्वर गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद ने मंगलवार रात को पवन मार्केट में आयोजित गणेश उत्सव में अपने प्रवचन दिए। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्रारंभिक शिक्षा में बच्चों को "ग " से जड़ता के प्रतीक गधा की बजाय बुद्धि के प्रतीक गणेश का उच्चारण करवाना चाहिए। न केवल गणेश बल्कि गाय, गीता और गंगा का उच्चारण करवाना चाहिये। ताकि बचपन से ही उन्हें अपनी परंपराओं का ज्ञान हो सके। क्योकि प्रारंभिक शिक्षा ही उच्च शिक्षा की नींव होती है, इसलिए बचपन में ही इस नीव को मजबूत बना देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारी परंपराएं, हमारे आदर्श, हमारे मूल्य ही हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं। गुरु जनो का ,अपने माता पिता पिता का आदर करना, गिरे हुए को उठाना, निर्बलों की सहायता करना ही हमारी परंपरा है। आज के इस भौतिकवाद की चकाचौंध में कुछ लोग इन आदर्शों को भूल जाते हैं।
जब पानी सर के ऊपर से निकल जाता है तब उन्हें अपनी भूल का अहसास होता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि लोगो के मन में भ्रम होता है कि अगर भगवान एक है तो हम इतने देवी देवताओं की पूजा क्यों करते हैं। गीता मनीषी ने कहा कि ये देश अवतारों का देश है। जब जब भी धर्म की हानि होती है तब तब भगवान अलग अलग रूप में अवतार लेते हैं। ये सभी उस अविनाशी के ही विभिन्न रूप है, लेकिन भगवान एक ही है जो इस जगत के कण कण में विद्यमान है।
गीता मनीषी ने भगवान गणेश जी के बारे में बताया कि भगवान गणेश जी जो भक्तों को बुद्धि और समृद्धि प्रदान करते है, उन्हें विघ्नहर्ता के नाम से भी बुलाया जाता है। इससे पूर्व महंत बंसी पूरी ने गीता मनीषी को शाल ओढ़ाकर उनका गणेश उत्सव में स्वागत किया।