संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। गो गीता गायत्री सत्संग समिति की ओर से सेक्टर सात के सामुदायिक केंद्र में चल रही भागवत कथा में आत्मदेव गोकर्ण धुंधकारी सहित राजा परीक्षित संवाद सुनाया गया। कथावाचक अनिल शास्त्री ने कहा कि भागवत कथा पतितों को भी मोक्ष प्रदान करती है।
उन्होंने बताया कि आत्मदेव ब्राह्मण बहुत ही सहनशील तपस्वी मनस्वी ज्ञानी ध्यानी तथा संपत्ति के मामले में कुबेर के समान थे, मगर सभी सुख होने के बावजूद भी संतति (पुत्र) सुख से वंचित थे। पुत्र प्राप्ति के लिए आत्मदेव ने अनेक उपायों को किया, मगर उनके प्रारब्ध में पुत्र का कोई योग नहीं था। फिर भी आत्मदेव ने सन्यासी के सामने निवेदन किया। आत्मदेव के भावों को देखते हुए सन्यासी दंडी महात्मा ने भगवद् प्रसाद आत्म देव को दिया।
उन्होंने कहा कि इस प्रसाद को तुम पत्नी को जाकर दे दो खिला दो, मगर प्रसाद देने के बावजूद भी पत्नी ने प्रसाद ग्रहण नहीं किया और गाय को दे दिया। भगवद प्रसाद के फलस्वरूप गो के पेट से एक पुत्र जन्म लिया जिसका सारा शरीर मनुष्य के समान था, किंतु कान गाय के समान थे. इसलिए नामा करण में आचार्यों ने उस पुत्र का नाम गोकर्ण रखा और धुंधली जनित संतान को आचार्यों ने धुंधकारी नाम प्रदान किया दोनों एक ही घर में रहते थे, लेकिन दोनों के प्रकृति में बहुत ही अंतर था। गोकर्ण बाल्यावस्था से ही ज्ञानी ध्यानी प्रवृत्ति के थे और धुंधकारी उदंड प्रवृत्ति का था।
कथावाचक ने बताया गोकर्ण घर की परिवारिक परिवेश को देखते हुए घर का त्याग किया तीर्थों का सेवन किया, मगर धुंधकारी घर में ही रहते हुए उदंड स्वभाव के वशीभूत होकर चारित्रिक पतन हो गया। पिता का कमाया हुआ धन संपदा को यूं ही अनायास ही सब समाप्त कर दिया। कालांतर में मरने के बाद प्रेत योनि को प्राप्त हो गया। संजोग बस धुंधकारी का बरसों बाद बड़े भाई के साथ साक्षात्कार हुआ।
बड़े भाई ने कृपा की और धुंधकारी को सूर्य नारायण भगवान के आदेशानुसार भागवत कथा सुनाई। भागवत कथा के फलस्वरूप धुंधकारी का प्रेत योनि से उद्धार हो गया। इस अवसर पर राम सिंह राणा, निवर्तमान नगर परिषद की अध्यक्ष उमा सुधा, पंडित रंगनाथ त्रिपाठी, मोहन लाल अरोड़ा, जय दत्त जोशी, मेन पाल चौहान, संजय कक्कड़ आदि मौजूद रहे।