कुरुक्षेत्र। गर्मी के तेवर तल्ख बने हुए हैं। लू का प्रकोप जारी है। आसमान से आग बरस रही है। ऐसे हालात में लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो रहा है। लोग गर्मी से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं तो वहीं बाजार में ठंडे पेय पदार्थों के साथ-साथ नींबू की मांग भी बढ़ गई है। ऐसे में नींबू महंगा हो गया है। 15 दिन पहले जहां नींबू 80 से 100 रुपये प्रति किलो बिक रहा था तो वहीं अब नींबू का रेट 150 से 160 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है।
लोगों को भीषण गर्मी का सामना पिछले कई दिनों से करना पड़ रहा है। सुबह से निकली सूर्य की तेज किरणें जमीन पर पड़ते ही गर्मी का आभास होना शुरू हो जाता है। 10 बजते ही हवा गर्म हो जाती है। जिससे लू सताने लगती है और इसका असर देर सायं तक रहता है। शुक्रवार को जिले का अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। भीषण गर्मी और लू से राहत पाने के लिए लोगों ने जहां ठंडे पेय पदार्थों का सेवन किया तो वहीं तेज धूप से बचने के लिए पेड़ों का सहारा भी लिया जबकि भीषण गर्मी और लू का असर बाजार में भी नजर आया, जिसके चलते बाजार में सन्नाटा छाया रहा। शुक्रवार को अधिकतम तापमान 45 डिग्री और न्यूनतम तापमान 29 डिग्री सेल्सियस रहा।
सब्जी विक्रेता सूरज रोहिल्ला का कहना है कि भीषण गर्मी और लू के चलते सभी सब्जियों के दामों में अभी हल्की बढ़ोतरी देखने को मिल रही है, जबकि नींबू की मांग ज्यादा होने के चलते रेट में काफी उछाल बना हुआ है। 15 दिन पहले नींबू जहां 80 से 100 रुपये किलो बिक रहा था तो वहीं अब नींबू 150 से 160 रुपये किलो के दामों तक पहुंच गया है, जिसका कारण मांग ज्यादा होना है। कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. नसीब सिंह का कहना है कि शनिवार को मौसम में हल्का परिवर्तन रहने के आसार बने हुए, जिससे हल्के बादल छाने की संभावना बनी हुई है। हालांकि अभी लू और भीषण गर्मी से कुछ दिनों तक लोगों को राहत नहीं मिलने वाली है।
प्राकृतिक खेती समय की मांग : डॉ. सीबी सिंह
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। कृषि वैज्ञानिक डाॅ. सीबी सिंह ने कहा कि आज बहुत से जागरूक वैज्ञानिक प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। वे जलवायु परिवर्तन और मिट्टी के क्षरण से निपटने के लिए प्राकृतिक खेती की आवश्यकता पर जोर देते हैं। मिट्टी की उर्वरता में कमी और खाद्य फसलों में पोषण में कमी के कारण प्राकृतिक खेती ही एकमात्र विकल्प है। अगर हम जलवायु परिवर्तन और मिट्टी के क्षरण से बचना चाहते हैं तो हम इसमें और देरी नहीं कर सकते हैं।
प्राकृतिक खेती प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठा कर की जाती है ताकि स्वस्थ सब्जियां उगाईं जा सकें। हमें जैविक और प्राकृतिक खेती के बीच के अंतर को समझना चाहिए। जैविक खेती जैविक रूप से संसाधित सामग्री जैसे जैव-उर्वरकों के इस्तेमाल की अनुमति देती है। यह उच्च उपज देने वाली किस्मों के इस्तेमाल की भी अनुमति दे सकती है लेकिन जब हम प्राकृतिक खेती की बात करते हैं, तो इसमें स्वदेशी बीजों और स्थानीय रूप से उपलब्ध हर चीज का इस्तेमाल होता है। हम खाद को मौके पर ही तैयार करते हैं और खाद की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पशुपालन को एकीकृत करते हैं। यह पारिस्थितिकी को संरक्षित करने और इसे पूरी क्षमता से उपयोग करने के बारे में है। हम रसायनों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरता खो रहे हैं।