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Kurukshetra News: शिक्षा की नींव मजबूत, किरमिच गांव से निकले दो-दो न्यायाधीश

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कुरुक्षेत्र। पौत्र भारत को जज नियुक्त होने पर मिठाई खिलाते दादा पूर्व न्यायधीश  श्याम लाल। स्वय
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-1955 में खुले पहले स्कूल से शुरू हुआ सफर, आज पांच सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे सैकड़ो बच्चे
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए पहचाने जाने वाले किरमिच गांव की एक पहचान शिक्षा और प्रतिभाओं से भी जुड़ी हुई है। वहीं इस गांव ने समय-समय पर कई अधिकारी, शिक्षक और कर्मचारी दिए हैं। सबसे खास बात यह है कि गांव के पहले न्यायाधीश श्याम लाल जांगड़ा रहे। उनकी विरासत को उनके पोते भारत जांगड़ा ने आगे बढ़ाया है। एक ही गांव से दो पीढ़ियों का न्यायिक सेवा तक पहुंचना ग्रामीणों के लिए गर्व का विषय बना हुआ है।

ग्रामीण बताते हैं कि गांव में शिक्षा की शुरुआत वर्ष 1955 में पहले सरकारी स्कूल के खुलने के साथ हुई थी। उस समय यह विद्यालय केवल प्राथमिक स्तर तक था। बाद में इसे मिडिल और फिर हाई स्कूल तक विस्तारित किया गया। समय के साथ शिक्षा का दायरा बढ़ता गया और आज गांव में पांच सरकारी स्कूल संचालित हो रहे हैं, इनमें लड़कों और लड़कियों के अलग-अलग विद्यालयों के साथ प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के स्कूल भी शामिल हैं।
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गांव के बुजुर्गों का कहना है कि शिक्षा के विस्तार का ही परिणाम है कि यहां से कई युवा विभिन्न सरकारी सेवाओं में पहुंचे हैं। पूर्व न्यायाधीश श्याम लाल जांगड़ा गांव के पहले जज बने थे। अब उनके पोते भारत जांगड़ा ने राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा में सफलता हासिल कर गांव का नाम रोशन किया है। वहीं गांव के ही प्रो. संदीप आईआईटी रुड़की में सीनियर प्रोफेसर के पद पर तैनात हैं।

किरमिच की पहचान केवल इतिहास और तीर्थों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा और उपलब्धियों की यह परंपरा भी इसे आसपास के गांवों से अलग बनाती है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि शिक्षा का यह सिलसिला इसी तरह आगे बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में गांव से और भी अधिकारी तथा न्यायिक सेवाओं में चयनित युवा निकलेंगे।




शिक्षा बनी गांव की सबसे बड़ी ताकत : प्रो. अजायब

केयू में हिंदी के प्रो. डॉ. अजायब सिंह ने बताया कि गांव का इतिहास शिक्षा के क्षेत्र में काफी विस्तृत है। गांव में जज से लेकर आईआईटी तक के चयनित प्रोफेसर हैं। गांव की पहचान ही शिक्षा से है। वे खुद भी केयू में हिंदी के प्रोफेसर हैं। उनका कहना है कि गांव के बच्चे यह सीखते हैं कि शिक्षा से ही आगे बढ़ा जा सकता है।




सरकारी स्कूल आज पूरे गांव की बन चुका पहचान : ग्रामीण सुरेश
गांव में 1955 में शुरू हुआ पहला सरकारी स्कूल आज पूरे गांव की पहचान बन चुका है। वर्तमान में पांच सरकारी शिक्षण संस्थान संचालित हैं, जहां आसपास के गांवों के बच्चे भी पढ़ने आते हैं। शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने से गांव के युवाओं ने प्रशासनिक, न्यायिक और अन्य सरकारी सेवाओं में अपनी पहचान बनाई है।



गांव में रहे कई रागनी कलाकार : ग्रामीण

गांव के ग्रामीण जीत सिंह बूरा का कहना है कि गांव में कई चर्चित रागनी कलाकार रहे हैं, जिनमें गुलाब बूरा रागनी के बड़े कलाकार रहे हैं, जो आज करनाल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। प्रेम बूरा काफी प्रसिद्ध रागनी गायक रहे हैं। वहीं पंडित प्रेम हरियाणवी हैं, जो आज भी रागनी गाते हैं।
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1979 में छोड़ दिया था आरक्षण, उस समय के सीएम बंसी लाल को लिखा था पत्र : पूर्व न्यायाधीश

पूर्व न्यायाधीश श्याम लाल जांगड़ा का कहना है कि जब वे गांव के पहले जज बने, उसी दिन उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसी लाल को पत्र लिखकर अपना जातिगत आरक्षण छोड़ दिया था। उन्होंने कहा कि आज उनके परिवार के सदस्य विभिन्न सेवाओं में हैं। पोता राजस्थान में जज है, दो पोतियां वकील हैं और एक पोती एमबीबीएस कर रही है साथ ही उनकी पुत्रवधू और बेटा भी सरकारी सेवाओं में हैं, जो बिना किसी आरक्षण की मदद के चयनित हुए हैं। उन्होंने बताया कि उनके पोते भारत जांगड़ा न्यायिक सेवा में चयनित होने के बाद उदयपुर की लॉ अकादमी में बतौर मजिस्ट्रेट अपनी सेवाएं शुरू कर चुके हैं।

कुरुक्षेत्र। पौत्र भारत को जज नियुक्त होने पर मिठाई खिलाते दादा पूर्व न्यायधीश  श्याम लाल। स्वय

कुरुक्षेत्र। पौत्र भारत को जज नियुक्त होने पर मिठाई खिलाते दादा पूर्व न्यायधीश  श्याम लाल। स्वय

कुरुक्षेत्र। पौत्र भारत को जज नियुक्त होने पर मिठाई खिलाते दादा पूर्व न्यायधीश  श्याम लाल। स्वय

कुरुक्षेत्र। पौत्र भारत को जज नियुक्त होने पर मिठाई खिलाते दादा पूर्व न्यायधीश  श्याम लाल। स्वय

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