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आज से श्रावण शुरु, शिवालयों में लगेगी शिवभक्तों की कतारें

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अमर उजाला ब्यूरो
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पिहोवा।
सोमवार से शुरू हो रहे सावन मास से शिवालयों में भक्तों की कतारें लगनी शुरू हो जाएंगी। सावन इसलिए भी खास है कि इसमें 5 सोमवार है और सावन की शुरुआत व समापन भी सोमवार के दिन ही होगा। कई सालों के बाद ऐसा संयोग बना है। संग्मेश्वर धाम में भक्तों की सुविधा के लिए सेवा दल की ओर से सभी तैयारियां पूरी कर ली गई है। सावन मास के चलते लाखों की तादाद में लोग यहां पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं।
पुराणों के अनुसार यहां भगवान शिव स्वयं लिंग रूप में प्रकट हुए थे, जो स्वयंभू लिंग के रूप में मुख्य मंदिर में आज भी विद्यमान हैं। मान्यता है कि यहां शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से तथा मंदिर के प्रांगण में स्थित बेल वृक्ष पर धागा बांधने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी के चलते लोग यहां संतान प्राप्ति, मानसिक तनाव कलह से मुक्ति, चुनाव में जीत सहित कई मन्नतें मांगने के लिए भक्त यहां पहुंचते हैं। जिसकी मन्नतें पूरी हो जाती है उन लोगों को पुन: धागा खोलने के लिए दोबारा आना पड़ता है। धाम की देखरेख का जिम्मा पंचायती अखाड़ा महानिवार्णी का है और महंत वासुदेव गिरि लाल बाबा यहां की व्यवस्था देख रहे हैं।
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दीमक की बांबी से लाई गई मिट्टी
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर दीमक बांबी से मिट्टी लाई गई। जिससे सावन में हर रोज पार्थिव शिवलिंग पूजन के लिए शिवलिंग बनाए जाएंगे और पूजन व रुद्राभिषेक के बाद में उस शिवलिंग को पानी में विसर्जित कर दिया जाएगा। महेंद्र वासुदेव गिरी ने बताया कि सावन मास में पार्थिव शिवलिंग की पूजा का विशेष फलदायक माना जाता है। इसकी पूजा अर्चना करने से विशिष्ट फल की प्राप्ति होती है और पित्तरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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संग्मेश्वर महादेव नाम हुआ विश्व विख्यात
पुराणों के अनुसार अरुणा संगम तीर्थ की महिमा महाभारत वामन-पुरान, गरुड़ पुराण, सं्कद पुराण, पद्म पुराण आदि ग्रंथों में वर्णित है। इसके बारे में एक लोक कथा है कि ऋषि वशिष्ठ और ऋषि विश्वामित्र में जब अपनी श्रेष्ठता साबित करने की होड़ लगी, तब ऋषि विश्वामित्र ने मां सरस्वती की सहायता से बहा कर लाए गए ऋषि वशिष्ठ को मारने के लिए शस्त्र उठाया, तभी मां सरस्वती ऋषि वशिष्ठ को वापस बहा कर ले गई। तब ऋषि विश्वामित्र ने सरस्वती को रक्त व पींप के साथ बहने का श्राप दिया। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए सरस्वती ने भगवान शंकर की तपस्या की और भगवान शंकर के आशीर्वाद से प्रेरित 88 हजार ऋषियों ने यज्ञ द्वारा अरुणा नदी व सरस्वती का संगम कराया। तब इस श्राप से सरस्वती को मुक्ति मिली। नदियों के संगम से भोले नाथ संगमेश्वर महादेव के नाम से विश्व में विख्यात हुए।
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दीमक के बीच से मिला था शिवलिंग
मान्यता के अनुसार यहां पुराने समय में महात्मा गणेश गिरि अपने शिष्यों सहित रहते थे और एक दिन वह झाड़ियों की तरफ घूम रहे थे। वहां उन्हें घास के बीच एक दीमक का ढेर दिखाई दिया। जब उन्होंने अपने चिमटे से इस ढेर को कुरेदकर देखा तो उनका चिमटा किसी ठोस चीज से टकराया। उन्होंने दीमक को हटाकर देखा तो उन्हें यहां बड़ा सुंदर और तेजस्वी शिवलिंग दिखाई दिया। उन्होंने सोचा कि क्यों इस शिवलिंग को यहां से उखाड़कर किसी साफ स्थान पर स्थापित कर दिया जाए। उन्हें खुदाई करते-करते शाम हो गई, लेकिन शिवलिंग का अंतिम छोर नहीं मिला। थक हारकर वे रात को सो गए। रात को उनके स्वप्न में भगवान शिव आए और उन्हें प्रेरणा दी कि वे इस शिवलिंग को यहां से हटाने का प्रयास ना करें। इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करें। सुबह जब वे उसी स्थान पर पहुंचे तो देखा कि एक बड़ा काला सर्प शिवलिंग से लिपटा हुआ था। तब उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी और यहां मंदिर बनवाने का संकल्प लिया।
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