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आपने मेरे बारे में जो लिखा,उसमें आत्मितयता अधिक,वास्तविकता कम है

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फोटो नंबर-28
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आपने मेरे बारे में जो लिखा, उसमें आत्मीयता अधिक, वास्तविकता कम है
- डॉ. ममगाई को भेजे पत्र में अटलजी ने लिखा, अपनत्व में दोष दिखाई नहीं देता
- पंचतत्व में विलीन हुई अटलजी का एक पत्र ममगाईं परिवार के लिए रहेगा धरोहर
राजेश शांडिल्य
कुरुक्षेत्र। यूं तो पहले और बाद में खास लोगों के पत्र कुरुक्षेत्र के सहदेव मार्ग स्थित डॉ. केशवानंद ममगाईं के आवास पर आ चुके थे। मगर मई 1993 को जो पत्र अटल बिहारी वाजपेयी ने भेजा, वो ममगाईं परिवार के लिए एक धरोहर बन चुका है। यह पत्र अटलजी और ममगाईं जी के बीच आत्मिक संबंधों दर्शाता है।
दरअसल, साहित्यकार डॉ. ममगाईं ने अटल जी पर एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में लेख लिखा था। इसे पढ़ने के पश्चात अटलजी ने जो लिखा वह कुछ यों था... आपने लेख में मेरे बारे में जो विचार व्यक्त किए हैं, उनमें आत्मीयता अधिक, वास्तविकता कम है। अपनत्व में दोष दिखाई नहीं देता...। यानी जिस लेख में एक लेखक ने अटल जी के व्यक्तित्व को जिस सच्चाई से पिरोया था, उसमें भी अटलजी को वास्तविकता से ज्यादा आत्मीयता और अपनत्व का भाव ही दिखा।
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गौरतलब है कि राजकीय पुरस्कार बाबू बालमुुकुंद गुप्त साहित्य अवार्डी डॉ. केशवानंद ममगाईं ने चार मई 1993 को अटल जी के व्यक्तित्व पर लेख लिखा था। इसके जवाब में 9 मई 1993 तो लिखे पत्र में अटल बिहारी वाजपेयी ने डॉ. ममगाईं का आभार व्यक्त करते हुए उपरोक्त उद्गार पत्र के माध्यम से व्यक्त किए थे। शुक्रवार शाम को जब अटलजी पंचतत्व में विलीन हुए तो इसकी लाइव कवरेज देख स्व. डॉ. ममगाईं की धर्मपत्नी सुशीला देवी फफक पड़ी।

तब पुस्तक की पहली प्रति अटलजी को ही भेंट की थी
पहली बार अटल जी के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देेने के पश्चात डॉ. ममगाईं ने अपनी पुस्तक हिंदी पत्रकारिता के विकास में हरियाणा की देन... की पहली प्रति अटल जी को भेंट की थी। इस दौरान हुई भेंट को डॉ. ममगाईं के परिवार के सदस्य आज भी याद करते हैं।
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लेखन के दौरान अटल जी के साथ संयोग
यह भी संयोग ही था कि स्व. लेखक, साहित्यकार, चिंतक, विश्लेषक और हिंदी पत्रकारिता में अमूल्य योगदान देने वाले डॉ. केशवानंद ममगाईं ने अटल बिहारी वाजपेयी के संपादन में प्रकाशित दैनिक स्वदेश, राष्ट्रधर्म, पांचजन्य सहित अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं में संवाददाता एवं लेखक के रूप में कार्य किया था। डॉ. ममगाईं की 1957 में हिंदी की रक्षा आंदोलन में सक्रिय भूमिका रही। तब उन्हें पांच माह कारावास की सजा हुई थी।
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