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गुमनाम संगमस्थली की खुदाई में 12 सीढ़ियों के नीचे मिली 7 हजार साल पुरानी रेत,शंख और सीपियां

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अरुणा, वरुणा और सरस्वती की संगमस्थली में खुदाई के समय 5 मीटर नीचे 7 हजार साल पुरानी रेत, शंख और सीपियां मिले हैं। अब तक सरस्वती का यह सातवां बेड है, जहां इस तरह की सामग्री अंवेक्षण के दौरान टीम को मिली है।
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लाजिमी रुप से इस साइट का मिलना हरियाणा सरस्वती हैरिटेज विकास बोर्ड के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं हैं, क्योंकि पिहोवा के धनीरामपुरा में यह संगमस्थली गुमनाम और उपेक्षित थी। 23 जून को हरियाणा सरस्वती हेरिटेज बोर्ड के संज्ञान में यह साइट आने के बाद यहां खुदाई और अंवेक्षण की योजना बनी थी। वहीं जांच पड़ताल के बाद सरकारी रिकार्ड से यह भी पता चला था कि इस तीर्थ के नाम 116 पुराने राजस्व विभाग के रिकार्ड में आठ कनाल 7 मरले भूमि दर्ज है। इसके बाद खुदाई कराने पर प्राचीन तीर्थ की 12 सीढ़ियां मिली हैं, जबकि इसके नीचे जाकर खुदाई करते समय टीम को सात हजार 300 बी.सी. समय का रेत और शंख मिले हैं। अमर उजाला से बातचीत करते हुए इसकी पुष्टि सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर रिसर्च ऑन द सरस्वती रिवर (सीईआरएसआर) केयू के निदेशक डा.एआर चौधरी ने की।
उन्होंने बताया कि यह घाट करीब 6 सदी पुराने हैं, जोकि करीब 12 फुट ऊपर से नीचे तक मिट्टी से दब चुके थे। खोद कर मिट्टी निकालने बाद इसके नीचे रेत की परतें निकली हैं, जिसमें रेत की लेयर के साथ शंख-सीपियां भी हैं। इससे साफ होता है कि यहां से सात हजार साल पहले अन्य नदियों के संगम के साथ सरस्वती का भी चैनल था। उन्होंने बताया कि ठीक इसी तरह की रेत, शंख और सीपियां भौर सैदां, मुगलवाली, संघौर सहित छह स्थानों से भी मिल चुके हैं और यह सातवीं साइट है, जहां रेत की परत पांच मीटर नीचे जाकर मिली है।
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एनआईडी को सौंपा सुंदरीकरण का जिम्मा
हरियाणा सरस्वती हैरिटेज विकास बोर्ड के वाइस चेयरमैन धुम्मन सिंह किरमिच ने बताया है कि इस प्राचीन तीर्थ का उल्लेख वामन पुराण से है, जहां कई ऋषियों ने घोर तपस्या की थी। इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख धर्मग्रंथों में मिलता है। उन्होंने कहा कि इस तीर्थ की खुदाई पूरी होने के बाद इसके सुंदरीकरण का कार्य शुरु होगा और इसकी नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन (एनआईडी) को सौंपा गया है।
दोनों रिवर फ्रंट भी एनआईडी ही करेगी डिजाइन
बोर्ड के वाइस चेयरमैन ने बताया कि एनआईडी के निदेशक डा.वनीता आहुजा ने मौके पर पहुंच कर अरुणा, वरुणा और सरस्वती की संगम स्थली को बोर्ड की टीम के साथ देखा था। उन्होंने इस संगमस्थली के साथ बिलासपुर (नदी के दोनों छोर पर आधा-आधा किलोमीटर के) में बनने वाले सरस्वती रीवर फ्रंट और पिहोवा के रिवर फ्रंट (नदी के दोनों छोर डेढ़ डेढ़ किलोमीटर) को भी डिजाइन करने की सहमति दी है।
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