महाशिवरात्रि पर 21 किग्रा भस्म से होगा भगवान शिव का भस्म शृंगार
अमर उजाला ब्यूरो
पिहोवा।
महाशिवरात्रि पर गाय के गोबर से बने उपलों की भस्म से भगवान शिव का भस्म अभिषेक होगा। संगमेश्वर धाम अरुणाय में महाशिवरात्रि पर लगने वाले मेले के लिए सेवादल तैयारियां कर रहा है। शिवरात्रि पर भोले नाथ के दर्शनों के लिए आने श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष व्यवस्था हो रही है। संगमेश्वर धाम सेवा दल के प्रधान महेश बत्रा ने बताया कि महाशिवरात्रि पर 13 फरवरी को लगने वाले मेले के दौरान श्रद्धालुओं के लिए ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया कि बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए दर्शनों की अलग से व्यवस्था की गई है। शिवरात्रि पर हजारों श्रद्धालु जल चढ़ाने पहुंचते है। ऐसे में दिव्यांगों और बुजुर्गों को चल चढ़ाने में परेशानी होती है। उनके लिए विशेष व्यवस्था की जा रही है। ऐसे श्रद्धालु अपने आराध्य के सीधे दर्शन कर सकेंगे।
कई दिनों से बनाई जा रही है भस्म
महाशिवरात्रि पर गाय के गोबर से बने उपलों की भस्म से भगवान शिव का शृंगार किया जाएगा। इसके लिए कई दिन पहले से तैयारियां चल रही हैं। महेश बत्रा ने बताया कि महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का भस्म शृंगार होगा। 13 फरवरी अर्द्ध रात्रि को विधिवत भगवान शिव का भस्म अभिषेक और विशेष पूजा होगी। इस दौरान श्रद्धालुओं को जल चढ़ाने के लिए द्वार पर ही रोका जाएगा। भस्म गाय के गोबर से बने उपलों से बनाई जा रही है। भस्म तैयार करने में कई दिन लगते हैं। भस्म बनाने के बाद उसे कपड़े से छानकर शुद्ध किया जाता है।
दीमक के बीच से मिला था शिवलिंग
यहां पुराने समय में महात्मा गणेश गिरि अपने शिष्यों सहित रहते थे। एक दिन वह झाड़ियों की तरफ घूम रहे थे। वहां उन्हें घास के बीच दीमक का ढेर दिखाई दिया। जब उन्होंने अपने चिमटे से इस ढेर को कुरेदकर देखा तो उनका चिमटा किसी ठोस चीज से टकराया। इस पर उन्होंने दीमक को हटाकर देखा तो उन्हें यहां बड़ा सुंदर और तेजस्वी शिवलिंग दिखाई दिया। उन्होंने सोचा कि क्यों न इस शिवलिंग को किसी साफ स्थान पर स्थापित कर दिया जाए। उन्हें खुदाई करते-करते शाम हो गई, लेकिन शिवलिंग का अंतिम छोर नहीं मिला। थक हारकर वे रात को सो गए। रात को उनके स्वप्न में भगवान शिव आए और उन्हें प्रेरणा दी कि वे इस शिवलिंग को यहां से हटाने का प्रयास न करें। इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करें। सुबह जब वह उसी स्थान पर पहुंचे तो देखा कि एक बड़ा काला सर्प शिवलिंग से लिपटा हुआ था। तब उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी और यहां मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। 1942 से कुछ समय पूर्व यहां के तत्कालीन सचिव महंत गिरधर नारायण गिरि ने यहां की दशा सुधारने का बीड़ा उठाया। भगवान शिव की कृपा से तत्कालीन सचिव की मांग पर संस्था ने यहां मंदिर बनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी। 1946 में यहां मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।
दूध से नहीं निकलता मक्खन
मान्यता है यहां दूध बिलोकर मक्खन नहीं निकाला जाता। यदि कोई प्रयास करता है तो दूध खराब हो जाता है। मंदिर परिसर में चारपाई का प्रयोग नहीं किया जाता। यदि कोई व्यक्ति यहां अशुद्धि फैलाने का प्रयास करता है तो उसे दंड मिलता है। मान्यता है कि बुखार से ग्रस्त व्यक्ति को यदि दो दिन मंदिर के भंडारे में भोजन कराया जाए तो बुखार उतर जाता है।