निजी चिकित्सकों को अब सिविल अस्पताल को देनी होगी टीबी के मरीज की जानकारी, मेडिकल स्टोर संचालक रखेगा दवाओं का हिसाब
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
अब कोई मरीज एमबीबीएस या एमडी डॉक्टर की सलाह के बिना सीधे मेडिकल स्टोर से टीबी दवा सहित सभी शेड्यूल-एच (नारकोटिक्स के अंतर्गत 46 शामिल) दवाएं नहीं ले सकेगा। हर मेडिकल स्टोर संचालक को इन दवाओं की बिक्री का हिसाब रखकर सिविल अस्पताल को देना होगा। सभी निजी डॉक्टरों से कहा गया है कि वह टीबी की दवा देने के बाद इसकी सूचना स्वास्थ्य विभाग को सूचित करें। ऐसा न करने पर डाक्टर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत तीन वर्ष तक की सजा भी हो सकती है।
एलएनजेपी अस्पताल के डिप्टी सिविल सर्जन एवं क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. शैलेंद्र खांबरा ने अमर उजाला को बताया कि संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनटीपीसी) में परिवर्तन करके टीबी को स्वास्थ्य विभाग ने नोटिफिएबल डिजीज घोषित कर दिया है।
पहले क्षय रोग के मरीजों को टीबी की दवाई सप्ताह में तीन बार चिकित्सक की सलाह पर स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में दी जाती थी। मरीजों को यह दवाई अब रोजाना खिलाई जाएगी। टीबी रोकथाम की दवाई डॉट्स सरकारी अस्पताल में नि:शुल्क दी जाती है। बताया गया कि एक लाख की जनसंख्या पर टीबी के 215 मरीज संभावित होते हैं। इनमें से लगभग 175 मरीज किसी सरकारी अस्पताल से, जबकि शेष निजी डॉक्टरों से दवाई लेते हैं। इससे मरीज वास्तव में दवा खा रहे हैं या नहीं, इसका पता नहीं चल पाता। इसलिए आंकड़े जुटाने में भी यह योजना कारगर होगी। डिप्टी सिविल सर्जन के अनुसार टीबी कंट्रोल करते हुए वर्ष 2025 तक वर्तमान के मुकाबले आधे से भी कम मरीज करने और देशभर से टीबी को वर्ष 2035 तक जड़ से खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है।
पंचकूला में दी तीन दिन विशेष ट्रेनिंग
स्वास्थ्य विभाग ने यह परिवर्तन हरियाणा प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर के क्षय रोगियों की वास्तविकता जांचने के लिए किया है। इसके मद्देनजर हाल ही में डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. खांबरा को 10, 11, 12 जनवरी को तीन दिन तक पंचकूला में स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों ने ट्रेनिंग दी है। इसके बाद डॉ. खांबरा ने लाडवा, पिहोवा, शाहाबाद, थानेसर सहित सभी मेडिकल स्टोर एसोसिएशन के प्रतिनिधियों, फार्मासिस्ट को बुलाकर शेड्यूल-एच दवाइयों का हिसाब रखने के निर्देश दिए हैं। इस बारे में आईएमए पदाधिकारियों की मीटिंग भी ली जा चुकी है।
निजी चिकित्सक दें टीबी मरीज की सूचना, मिलेंगे 500 रुपये
नए नियमों के तहत मरीज की सूचना स्वास्थ्य विभाग को मिलते ही निजी डॉक्टर को प्रोत्साहन के तौर पर 500 रुपये दिए जाएंगे। इलाज पूर्ण करने पर इसकी सूचना पुन: स्वास्थ्य विभाग को देना होगी। डॉक्टर को 500 रुपये इलाज पूर्ण करने की सूचना पर दिए जाएंगे। सरकार टीबी के सभी मरीजों को भी खुराक के लिए प्रतिमाह 500 रुपये देने जा रही है।
मेडिकल स्टोर संचालकों को भी मिलेगा पांच हजार तक मानदेय
निजी चिकित्सकों की तरह मेडिकल स्टोर संचालक को भी दवा का पर्चा आते ही इसकी सूचना स्वास्थ्य विभाग को देनी होगी। इस पर उसे सौ रुपये दिए जाएंगे। स्वास्थ्य विभाग द्वारा टीबी की दवा खिलाने वाले डीओटी प्रोवाइडर को कैटेगरी-1 का छह माह तक इलाज पूर्ण करने पर एक हजार रुपये, कैटेगरी-2 का इलाज पूर्ण करने पर 1500 और जटिल टीबी केस का इलाज दो वर्ष तक सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर पांच हजार रुपये मानदेय दिया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग का सहयोग करने पर मरीज, डॉक्टर, मेडिकल स्टोर संचालक और डॉट प्रोवाइडर की सहयोग राशि उनके बैंक खातों में आएगी। इसके लिए उन्हें बैंक खाता और आधार नंबर देना होगा।
बगैर परामर्श शेड्यूल-एच दवाइयों से नशाखोरी का आशंका
ऐसा करने का मुख्य कारण शेड्यूल-एच श्रेणी की 46 दवाओं का मेडिकल स्टोर संचालकों से रिकार्ड लेना है। विशेषज्ञों का मानना है कि एमबीबीएस या एमडी डॉक्टर किसी टीबी या अन्य मरीज को शेड्यूल-एच दवाई लिखता है तो वह उसके इलाज को दर्शाती है। लेकिन, जब लोग अपनी मर्जी से इन दवाओं को मेडिकल स्टोर से खरीदते हैं तो इससे नशाखोरी का संकेत माना जाएगा। इसलिए देश-प्रदेश में नशाखोरी को रोकना भी मुख्य लक्ष्य माना जा रहा है।