शारदीय नवरात्र कल से, सुबह 6:22 से 7:25 बजे तक करें कलश स्थापना
धर्मनगरी में कल से शुरू होगी नवरात्र उत्सव की धूम, श्रद्धालुओं में बना उत्साह
- चैत्र व शारदीय नवरात्रि का पर्व मनाए जाने का है विशेष महत्व
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र। शारदीय नवरात्र का पहला व्रत बुधवार को होगा। कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 06:22 से 07:25 बजे तक एक घंटे का रहेगा। इस बार द्वितीया तिथि का क्षय होगा और 19 अक्तूबर को विजयदशमी का पर्व मनाया जाएगा।
नवरात्र को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है। वहीं, मंदिरों में भी विशेष तैयारियां की जा रही हैं। नवरात्र उत्सव को लेकर जहां मंदिरों को सजाया जा रहा है वहीं बाजारों में भी इससे संबंधित सामान की खरीद कई दिनों से शुरू हो चुकी है। देश में चैत्र व शारदीय नवरात्रि का पर्व मनाए जाने का विशेष महत्व माना जाता है। इसके अलावा गुप्त नवरात्रि भी विशेष पूजा करने वालों के लिए होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन नौ दिनों के दौरान मां दुर्गा धरती पर ही रहती हैं। चैत्र महीने के नवरात्रि के पहले दिन ही मां दुर्गा का जन्म हुआ था, इस कारण चैत्र की नवरात्रि मनाई जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार नवरात्रि का महत्व के बारे में एक बात यह भी निकलती है कि मां दुर्गा ने इन नौ दिनों के दौरान दानव महिषासुर के साथ लड़ाई के बाद उसका वध किया था। इस त्योहार पर लोग उपवास रखते हैं और नौ देवियों की पूजा करते हैं, जबकि दसवें दिन विसर्जन किया जाता है। इसको विजयदशमी या दशहरा के रूप में मनाया जाता है।
नवरात्रि प्रथमा तिथि घट स्थापना, चंद्रदर्शन, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी पूजा 10 अक्तूबर
- द्वितीया तिथि ब्रह्मचारिणी तिथि का क्षय
- तृतीया तिथि चंद्रघंटा 11 अक्तूबर
- चतुर्थी तिथि कूष्मांडा 12 अक्तूबर
-पंचमी तिथि स्कंदमाता 13 अक्तूबर
-षष्ठी तिथि कात्यायनी 14 व 15 अक्तूबर
-सप्तमी तिथि कालरात्रि 16 अक्तूबर
- अष्टमी तिथि महागौरी 17 अक्तूबर
- नवमी तिथि सिद्धिदात्री 18 अक्तूबर
-दशमी तिथि विजयदशमी 19 अक्टूबर
नवरात्र में अखंड ज्योत का महत्व
श्री दुर्गा देवी मंदिर पिपली के अध्यक्ष व कॉस्मिक एस्ट्रो पिपली के निदेशक डॉ. सुरेश मिश्रा के अनुसार, अखंड ज्योति को जलाने से घर में हमेशा मां दुर्गा की कृपा बनी रहती है। नवरात्र में अखंड ज्योति के कुछ नियम होते हैं जिनका नवरात्र में पालन करना होता है। परंपरा है कि जिन घरों में अखंड ज्योति जलाते हैं उन्हें जमीन पर सोना होता है।
कलश स्थापना और पूजन सामग्री
मिट्टी का पात्र और जौ के 11 या 21 दाने, शुद्ध साफ की हुई मिट्टी जिसमें पत्थर नहीं हों, शुद्ध जल से भरा हुआ मिट्टी, सोना, चांदी, तांबे या पीतल का कलश, अशोक या आम के पांच पत्ते, कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन, साबुत चावल, एक पानी वाला नारियल, पूजा में काम आने वाली सुपारी, कलश में रखने के लिए सिक्के, लाल कपड़ा या चुनरी, मिठाई, लाल गुलाब के फूलों की माला व मौली।
ध्यान देने योग्य बात
जो कलश आप स्थापित कर रहे हैं वह मिट्टी, तांबे, पीतल, सोने या चांदी का होना चाहिए। भूल से भी लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग नहीं करें। नव का अर्थ नौ तथा अर्ण का अर्थ अक्षर होता है। अत: नवार्ण नौ अक्षरों वाला वह मंत्र है, नवार्ण मंत्र ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे’ है। नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है। नवार्ण मंत्र का जाप 108 दाने की माला पर कम से कम तीन बार अवश्य करना चाहिए। ब्रह्मांड के सारे ग्रह एकत्रित होकर जब सक्रिय हो जाते हैं, तब उसका दुष्प्रभाव प्राणियों पर पड़ता है। ग्रहों के इसी दुष्प्रभाव से बचने के लिए नवरात्रि में दुर्गा की पूजा की जाती है।