एक जमाने में उपराष्ट्रपति थे हिंदी के खिलाफ
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
हिंदुस्तान के मौजूदा उपराष्ट्रपति एक जमाने में हिंदी भाषा के खिलाफ दक्षिण भारत में शुरू हुए आंदोलन का हिस्सा रहे। छात्र जीवन के दौरान उन्होंने न केवल इस आंदोलन में भाग लिया, बल्कि इस दौरान जिन सरकारी स्थलों पर हिंदी भाषा में लिखा हुआ था, उस पर कालिख पोत दी थी। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के 31वें दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति ने उस पुरानी याद को ताजा करते हुए बताया कि जब उन्हें हिंदी भाषा के महत्व और अपनी गलती का अहसास हुआ तो ऐसा लगा कि उन्होंने वो कालिख डाकघर के लेटर बॉक्स पर नहीं, बल्कि अपने मुंह पर डाली थी, जिसका उन्हें काफी पछतावा भी हुआ था। दरअसल हिंदी पर कालिख पोतने के संस्मरण के जरिए उपराष्ट्रपति ने युवा पीढ़ी को संदेश दिया कि वे जोश में होश कतई न खोएं। प्रदर्शन और आंदोलन के नाम पर सरकारी और निजी संपत्ति को निशाना कतई न बनाएं। जिस तरह धरना, प्रदर्शन और आंदोलन करना हमारा अधिकार है, उसी तरह सरकारी और गैर सरकारी संपत्ति को हम किसी भी सूरत में क्षति न पहुंचाएं। ये दायित्व भी प्रत्येक देशवासी का है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आज हिंदी भाषा के साथ युवाओं को अन्य भाषाओं का भी ज्ञान होना जरूरी है। हिंदी के बिना देश कभी आगे नहीं बढ़ सकता। राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने के लिए हिंदी के साथ सभी भाषाओं का ज्ञान जरूरी है।
इस तरह भी खास बना ये मंच
उपराष्ट्रपति का वक्तव्य भले भारत की अनमोल संस्कृति में रचा-बसा रहा, पर साथ ही केयू के मंच पर जो खास फ्रेम बना उसमें विशुद्ध भारतीय संस्कृति के दर्शन भी हुए। यह दूसरी बार था जब हरियाणा की मदर यूनिवर्सिटी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भले पुराने ढर्रे को छोड़ भारतीय परिधान अपनाया गया था। इसके अलावा इस दीक्षांत समारोह के मंच पर जो तीन हस्तियां विराजमान रहीं वे दक्षिण भारत, मध्य प्रदेश, हरियाणा के पहनावे का भी प्रतिनिधित्व करती नजर आईं।
जुलाई में जन्मी तीनों हस्तियां दिखीं पारंपरिक पहनावे में
आंध्र प्रदेश में जन्मे भारत के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू लुंगी-कुर्ता, मध्य प्रदेश में जन्मे हरियाणा के राज्यपाल धोती-कुर्ता और हरियाणा के शिक्षामंत्री प्रो.रामबिलास शर्मा पारंपरिक कुर्ता-पायजामा में दिखे, जोकि विशेष रूप से नहीं, अमूमन इसी पहनावे में होते हैं। भारतीय सभ्यता पर गर्व करने वाली इन तीनों हस्तियों का जन्म भी जुलाई माह का ही है। इनमें उपराष्ट्रपति एक जुलाई 1949, राज्यपाल एक जुलाई 1939 और शिक्षामंत्री का जन्म 25 जुलाई 1951 का है।
वेद से गुगल व उपनिषद से इंटरनेट के सफर पर बोले वैंकेया
उपराष्ट्रपति का पूरा संबोधन संस्कृति, सभ्यता, विकास और महिलाओं के सम्मान के साथ देश और युवा के स्वर्णिम भविष्य पर आधारित रहा। उन्होंने भारत में वेदों से लेकर गूगल और उपनिषदों से इंटरनेट तक के सफर के बीच हुए परिवर्तन और संभावनाओं के साथ भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत संभालने की अपील की।
रेप जैसी घटनाओं का दर्द आया बाहर
उपराष्ट्रपति ने कठुआ व देश के दूसरे हिस्सों में बच्चियों व महिलाओं के साथ हो रही घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे शर्मनाक बताया। केयू में बेटियों की उपलब्धियों पर गदगद् उपराष्ट्रपति ने वैदिक काल से बेटियों के सम्मान का स्मरण कराते हुए कहा कि केवल शिक्षा, रक्षा और धन की देवी ही नहीं, बल्कि इस देश की सभी नदियों के नाम भी महिलाओं के नाम पर हैं। जो इस बात का प्रमाण है कि वेदों में महिलाओं को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
गुरु का स्थान नहीं ले सकता गूगल
उपराष्ट्रपति ने युवा पीढ़ी को 5 बिंदुओं मां, जन्मभूमि, मातृभाषा, मातृदेश और गुरु का सम्मान करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि यह आईटी और इंटरनेट गूगल का जमाना है, लेकिन गुरु का स्थान गूगल कभी नहीं ले सकेगा।