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मौसम की भविष्यवाणी हो रही है गलत साबित, बदल गया मौसम का मिजाज

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बारिश न होने से उम्मीदों पर फिर रहा पानी, किसानों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ
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फोटो नंबर - 2, 3
मौसम की भविष्यवाणी हो रही है गलत साबित, बदल गया मौसम का मिजाज
- बारिश न होने से उम्मीदों पर फिर रहा पानी, किसानों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ
- खेती के लिए अच्छी बारिश की दरकार, पर सूखे का बना डर
दीपक शर्मा
कुरुक्षेत्र। जिला में पूर्वानुमान के बावजूद अच्छी बरसात न होना आमजन से लेकर किसानों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। जहां आमजन भीषण लू के बाद अब चिपचिपी गर्मी से बेहाल हैं, वहीं बरसाती मौसम में भी खेतों तक पर्याप्त पानी न पहुंचना किसानों के लिए चिंता का सबब बना है। सबसे ज्यादा असर पिहोवा और इस्माईलाबाद के खेत-खलिहानों पर पड़ रहा है। धान की उम्दा पैदावार के लिए अच्छी बारिश की उम्मीद लगाए खेतों में जी-जान से जुटे किसानों के चेहरे मुरझा गए हैं।
आलम ये है कि पानी की कमी के चलते खेतों में दरारें आ चुकी हैं। फसल सूखने लगी है। धान के पौधों को बचाने के लिए किसान जरूरी सामग्री जुटाकर बिजली एवं डीजल इत्यादि पर अतिरिक्त खर्च करने को मजबूर हैं। हालांकि इसके बाद भी जो पानी आता है, वो भी अधिकांशत: दरारें पी जाती हैं, जिससे धान के पौधों पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाता। जिले के अधिकांश किसान चिंता में हैं कि ऐसी स्थिति में वह ज्यादा खर्च करके भी क्या लाभ कमाएंगे। गौरतलब है कि मौसम वैज्ञानिकों द्वारा जिला में 11 से 17 जुलाई तक अच्छी बरसात का अनुमान लगाया गया था, लेकिन हल्की-बूंदाबादी होने से यह भविष्यवाणी अभी तक गलत साबित होती दिख रही है। अब नए अनुुमान के अनुसार अच्छी बारिश के लिए 19,20 जुलाई का इंतजार करना पड़ेगा।
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पिछले और इस वर्ष जून, जुलाई में हुई बरसात
वर्ष 2017 के जून माह में 194 एमएम और जुलाई में 81 एमएम बारिश हुई। वहीं वर्ष 2018 में जून में 99.1 एमएम, जबकि जुलाई में 85 एमएम बारिश दर्ज की गई। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो अप्रैल से सितंबर तक के बरसाती मौसम में 600 एमएम बारिश को सामान्य माना जाता है, लेकिन अप्रैल से अभी तक करीब चार माह में 260 के आसपास बारिश का अंदाजा लगाया गया है।

पश्चिमी विक्षोभ के कारण मॉनसून कमजोर: डॉ. कर्मचंद
कृषि वैज्ञानिक डॉ. कर्मचंद ने कहा कि पश्चिमी विक्षोभ के कारण मॉनसून कमजोर पड़ गया है। हवा का दबाव कम होने से मौसम में अचानक परिवर्तन आया है। इसीलिए खुलकर बारिश नहीं हो पा रही। पिछले दो वर्षों में बारिश इन दिनों में उम्मीद से कम रही है। वर्ष 2018 के जुलाई माह में 39.2 एमएम, मई में 16.9 एमएम, जून में 99.1 एमएम और जुलाई में आधे माह तक 107 एमएम बारिश दर्ज की गई। इस बार पिहोवा और इस्माईलाबाद में बारिश के चलते क्षेत्र ज्यादा प्रभावित है। किसानों पर बिजली और डीजल इत्यादि का अतिरिक्त खर्च भी बढ़ा है। बारिश न होने तक किसानों को सलाह दी जाती है कि वे खेतों में पानी खड़ा न करके केवल समय-समय पर गीला करते रहें और बरसात तक सूखा लगने से बचाएं। डॉ. कर्मचंद के अनुसार 19 और 20 जुलाई को अच्छी बारिश होने की संभावना है।

इस्माईलाबाद में घटाएं छाईं, पर बारिश न आई और खेतों में पड़ीं दरारें
इस्माईलाबाद। प्रदेश में मॉनसून सक्रिय होने के बाद भी कस्बा एवं क्षेत्र में बरसात न होने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। धान की फसल को फुटाव के लिए बरसात की अधिक आवश्यकता थी, लेकिन किसान अभी भी अच्छी बरसात के इंतजार में हैं। पिछले दिनों से लगातार बढ़ रही गर्मी एवं उमस से धान के खेतों में पानी खत्म होने से दरारें पड़ गई हैं। किसान बलदेव शर्मा, राजेश कुमार, तरसेम, संजीव, अनिल, दीपचंद, राजीव गोस्वामी, प्रदीप, पवन गोस्वामी, दारा, सुभाष तथा कृष्ण शर्मा इत्यादि ने बताया कि प्रदेश में चारों तरफ अच्छी बरसात हो रही है, लेकिन क्षेत्र में 3 और 4 जुलाई को हल्की बूंदाबांदी हुई। उमस व गर्मी बढने से धान के खेतों में पानी की लागत भी बढ़ गई और दरारें भी। किसानों ने कहा कि पिछले तीन-चार दिन से लगातार बादल छाए हैं और घनघोर घटा भी उठती है, लेकिन किसानों को बारिश का इंतजार करना पड़ रहा है। धान के पौधे को फुटाव के लिए इस समय बरसात की अधिक जरूरत है। उन्होंने कहा कि सही मौके पर बरसात न होने का असर धान की निकासी पर पड़ेगा।
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बरसात से गर्मी में कुछ राहत, फसलों पर कोई असर नहीं
पिहोवा। मंगलवार सुबह हुई बरसात ने लोगों को कुछ राहत देने दी है। आधा घंटा हुई इस बरसात से मौसम में कुछ ठंडक तो हुई, लेकिन दोपहर के समय धूप निकलने से एक बार फिर मौसम गर्म हो गया। जुरासी खुर्द के किसान कुलवंत सिंह ने बताया कि धान की फसल को पानी की ज्यादा जरूरत होती है। इस बरसात से धान की फसल पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। अगर बारिश ज्यादा होती तो फसल के लिए अच्छा फायदा होता। सब्जी की फसल पर भी इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। ज्यादा बारिश से सब्जी की फसल खराब होने का डर बना रहता है। बतां दे पिहोवा क्षेत्र को डार्क जोन में शामिल किया हुआ है। यहां भूमिगत जलस्तर काफी नीचे जा चुका है। ऐसे में बारिश न होना यहां के किसानों के लिए काफी चिंताजनक है।
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