संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। हरियाणा, उत्तराखंड व दिल्ली की 11 खुंब प्रसंस्करण इकाइयों को 105 करोड़ का वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) थमाया गया है, जिससे संचालकों में हड़कंप मच गया है। इन फर्मों में दो कुरुक्षेत्र की भी है जबकि अन्य दिल्ली व उत्तराखंड से संबंधित है। इससे न केवल प्रसंस्करण इकाई संचालकों में रोष गहरा गया है बल्कि उन्होंने प्रोसेसिंग बंद करने का भी ऐलान कर दिया है। इसके साथ ही सरकार से मांग की है कि इस पर संज्ञान लेते हुए राहत देने का कार्य करें, ताकि हजारों लोगों के रोजगार पर विपरीत असर न पड़े।
जिले के खुंब प्रसंस्करण इकाई संचालक शनिवार को एकजुट हुए तो इसके प्रति गहरा रोष भी प्रकट किया। इस दौरान बातचीत करते हुए सबसे हरपाल सिंह बाजवा व अन्य लोगों ने खुंब प्रसंस्करण इकाइयों को जारी किए नोटिस पर एचएसएन कोड के गलत वर्गीकरण का आरोप लगाया गया है। विशेष रूप से एचएसएन 0711 (अस्थायी रूप से संरक्षित सब्जियां, तत्काल उपभोग हेतु नहीं) और एचएसएन 2003 (तैयार या संरक्षित सब्जियां, तत्काल उपभोग हेतु) के बीच यह वर्गीकरण माना गया है। इन नोटिसों में पिछले सात वर्षों के लिए 105 करोड़ का रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स मांगा गया है, जो उभरते मशरूम प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
तत्काल उपयोगी नहीं होता कैंड बटन मशरूम
हरपाल सिंह बाजवा व अन्य संचालकों ने बताया कि कैंड बटन मशरूम जो कि इस क्षेत्र का एक प्रमुख प्रसंस्कृत उत्पाद है। खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय संस्थान (निफ्टेम) की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार कैंड बटन मशरूम को तत्काल उपभोग योग्य नहीं माना जा सकता और इसलिए यह अध्याय सात, एचएसएन 0711 के अंतर्गत आता है, जो अस्थायी रूप से संरक्षित सब्जियों के लिए निर्धारित है। उल्लेखनीय है कि एचएसएन 0711 के अंतर्गत आने वाले उत्पादों पर 31 दिसंबर 2018 तक पांच फीसदी जीएसटी लागू था। हालांकि जीएसटी विभाग ने एक जनवरी 2019 से इस श्रेणी पर जीएसटी की दर को शून्य फीसदी कर दिया गया था, जिससे मशरूम उद्योग को उस समय बड़ी राहत मिली थी।
अब, अधिकारियों द्वारा कैंड बटन मशरूम को एचएसएन 2003 के अंतर्गत पुन: वर्गीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है, जो पूर्ण रूप से तैयार, उपभोग हेतु तैयार सब्जियों पर लागू होता है, जिस पर अधिक जीएसटी दर लगती है और परिणामस्वरूप भारी रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स मांगे जा रहे हैं। यह पुन: वर्गीकरण न केवल जीएसटी दर को पूरी तरह बदल देता है, बल्कि इसे लेकर उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम न केवल अनुचित है, बल्कि वित्तीय रूप से भी विनाशकारी है।