माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। नौकरी भले ही हम अंग्रेजी के जरिए हासिल कर लेते हाें मगर दिल की बात हमेशा हिंदी में ही की जाती है। फिर चाहे बात रोजगार की हो या पारिवारिक हालात की। भारतीय हमेशा हिंदी में ही चर्चा करते हैं। यह कहना है हिंदी विशेषज्ञों का। शुक्रवार को दयाल सिंह महाविद्यालय में हिंदी को लेकर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। जिसमें वक्ताओं ने सड़क से संसद तक हिंदी में काम की मांग उठाई। उनका कहना है कि हिंदी का विदेश में डंका है पर अलग पहचान बनाने के लिए हर क्षेत्र में व्यवहार में लाना जरूरी है।
हिंदी संगम फाउंडेशन न्यूजर्सी (अमेरिका) के संयुक्त तत्वावधान व उच्चतर शिक्षा विभाग के अनुदान से आयोजित वैश्वीकरण के दौर में हिंदी की चुनौतियां एवं संभावनाएं विषय पर वक्ताओं ने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्या डॉ. आशिमा गक्खड़ ने की। नार्वे की राजधानी ओस्लो से डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल मुख्यातिथि के रूप में पहुंचे। उन्होंने कहा कि आज युवा हिंदी को आगे बढ़ाने में लगे हैं। विदेशों में हिंदी की लोकप्रियता बढ़ रही है।
मंच संचालन डॉ. सुभाष सैनी, बलबीर सिंह, जय कुमार और यशवंती ने किया। हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रणधीर सिंह, डॉ. रमाकांत, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से डॉ. ज्योति शर्मा, डीएवी कॉलेज चीका से डॉ. जयबीर, सत्यवती कॉलेज दिल्ली से रचना बिमल, भगवान परशुराम कॉलेज कुरुक्षेत्र के प्राचार्य डॉ. शीशपाल और डॉ. राजबीर गुलिया ने भी विचार रखे।
सांस्कृतिक संबंधों के कारण हिंदी का नेपाल से नाता
त्रिभुवन विश्वविद्यालय काठमांडू (नेपाल) के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. श्वेता दिप्ति ने ऑनलाइन जुड़कर बताया कि हिंदी भारत की राजभाषा है, पर नेपाल की यह प्राचीन भाषा है। नेपाल और भारत के सांस्कृतिक व धार्मिक संबंधों के कारण हिंदी नेपाल में खूब फैल रही है। वहीं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष सुभाष चंद्र ने कहा कि हिंदी को आगे बढ़ाना हम सबका संविधानिक दायित्व है। जब तक हिंदी को हम व्यावहारिक रूप से नहीं अपनाते तब तक आगे नहीं बढ़ सकती।