- डॉक्टर बनाना चाहते थे माता-पिता, सैनिक दादा की प्रेरणा से बेटी ने देखा वर्दी का सपना, फिर सर्जन बनकर सेना पैरा स्पेशल फोर्स में गईं
- कॉल पर मां बोलीं, मोर्चा फतह करके लौटना, जवानों की हिम्मत बढ़ाना
गगन तलवार
करनाल। चीन युद्ध में सैनिक रहे दादा के किस्से सुनकर बचपन में बेटी ने सेना की वर्दी पहनने का सपना देखा, लेकिन चिकित्सक पिता बेटी को डॉक्टर बनाना चाहते थे। मगर बेटी की जिद के आगे पिता को झुकाने में मां ने बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने पहले बेटी को डॉक्टर बनाकर पिता का सपना पूरा किया, फिर डॉक्टर बेटी को भारतीय सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा परीक्षा की तैयारी करा उसके सपनों को भी पंख लगाए। आज वह देश के जवानों के जीवनरक्षक के तौर पर सीमा पर सेवाएं दे रही हैं।
यह कहानी है भारतीय सेना की मेजर डॉ. पायल छाबड़ा की। जो इन दिनों हुसैनी वाला बॉर्डर के आर्मी अस्पताल में सीनियर सर्जन के रूप तैनात है। पैरा स्पेशल फोर्स की पहली महिला सर्जन डॉ. पायल से शुक्रवार को ही उनके पिता डॉ. राजेंद्र कुमार और माता डॉ. वीना से कॉल पर बात हुई। जिस समय बात हुई उस समय भी शैलिंग हो रही थी। अभिभावकों ने बताया कि उस समय भी बेटी का हौसला बुलंद था। मां ने बेटी से कहा कि जिस जिम्मेदारी के लिए आपने वर्दी पहनी है, उसे बखूबी निभाना। देश की रक्षा के लिए तैनात जवानों का घायल होने पर हिम्मत बांधना। भारतीय सेना में सर्जन नियुक्ति से उनकी देश सेवा में भी जिम्मेवारी बढ़ी है।
होली के बाद 20 दिन के लिए वह घर आई थी। 2023 में प्रशिक्षित पैरा परीक्षा पास करके वह पीएसएफ कमांडो बनीं। आगरा के पैराट्रूपर्स ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षण के दौरान उन्हें मैरून बेरेट खिताब से भी सम्मानित किया गया। भारत में यह उपलब्धि हासिल करने वाली और पीएफएफ में नियुक्ति पाने वाली वे एकमात्र महिला सर्जन हैं।
कल्पना के संस्थान से खुला सेना में जाने का रास्ता
मूल रूप से कलायत की रहने वाली डॉ. पायल की मां डॉ. वीना ने बताया कि पायल ने सेना में सर्जन बनकर ड्यूटी करने के लिए एमबीबीएस के बाद एमएस सर्जरी में पढ़ाई की। अगस्त 2020 में करनाल के कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज में नौकरी लगते ही उसे 3.50 लाख रुपये मासिक पैकेज पर कई निजी अस्पतालों से ऑफर आई। लेकिन उसने अपने लक्ष्य की ओर ही कदम बढ़ाए। दिसंबर 2020 में भारतीय सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया 18वां रैंक पाया और अंबाला कैंट के आर्मी अस्पताल में पहली तैनाती हुई। यहां के बाद लेह लद्दाख और जालंधर में भी सेवाएं दे चुकी हैं। पिता ने बताया कि कोरोना काल में डॉ. पायल ने मेडिकल कॉलेज में कोरोना मरीजों की सेवा की। यहीं रात में पढ़ाई करके उसका सेना में जाने का रास्ता खुला।
सैनिक दादा बताते थे गोलाबारी में घायल सैनिकों की कहानी
डॉ. पायल के दादा स्वर्गीय चमन लाल भारतीय रेलवे में अधिकारी रहे। पिता डॉ. राजेंद्र बताते हैं कि 1962 में चीन युद्ध के समय देश में प्रशिक्षित सैनिक कम थे। तब रेलवे के अधिकारियों को भी सैन्य प्रशिक्षण दिया। उन्होंने जंग में देश की रक्षा की। रिटायरमेंट के बाद अकसर घर पर युद्ध के हालात पर चर्चा होती थी। पाकिस्तान या चीन की तरफ से जब भी गोलीबारी की जाती थी, तो उस समय हमारे जवान भी बड़ी संख्या में घायल होते थे। उनके इन्हीं किस्सों ने पायल में सेना में जाने का जोश भरा। डॉ. पायल के परिवार में बड़े भाई और भाभी भी डॉक्टर हैं।