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Karnal News: भूमिगत जलगुणवत्ता मानचित्र तैयार, देश में बंपर होगी फसलों की पैदावार

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भूमिगत जलगुणवत्ता मानचित्र तैयार, देश में बंपर होगी फसलों की पैदावार
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सीएसएसआरआई में देशभर के वैज्ञानिक राष्ट्रीय कार्यशाला में कर रहे मंथन
13 राज्यों में भूमिगत जल का किया गया है परीक्षण, हरियाणा व पंजाब भी शामिल

कहां कैसा भूजल है, कितनी लवणता व क्षारीयता, इसका रखा गया है खास ध्यान
मैप में कहां कौन सी फसल होगी बेहतर, इसके लिए गाइडलाइन होगी जारी

देव शर्मा
करनाल। जलवायु परिवर्तन भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है। इसे स्वीकार करते हुए देश के वैज्ञानिकों ने जल आधारित एक ऐसा मानचित्र तैयार किया है, जिसकी गाइड लाइन से न सिर्फ भूजल की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि फसल की भी बंपर पैदावार होगी। इसके तहत खराब पानी में भी फसलों की अच्छी पैदावार लेने की तैयारी है। इसके लिए अखिल भारतीय भूमिगत जल गुणवत्ता मानचित्र (ग्राउंड वाटर क्लाविटी मैप ऑफ इंडिया) तैयार किया गया है। जिस पर फिलहाल मंथन चल रहा है। इस मानचित्र को दो दिन बाद ही देश के लिए जारी किया जा सकता है।

केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल में शुरू हुई दो दिवसीय 28वीं द्विवार्षिक कार्यशाला में भाग लेने पहुंचे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक डॉ. वेल मुर्गन ने बताया कि देश में शुष्क और अर्द्धशुष्क वातावरणीय स्थिति पर शोध कार्य लंबे समय से चल रहा है। कई क्षेत्रों में देखा गया है कि बिहार, उड़ीसा, बंगाल व पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत को छोड़कर देश के खासकर 13 राज्यों में भूमिगत जल का सघन परीक्षण किया गया है। इसमें हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल आदि शामिल हैं। किस राज्य में कहां कैसा भूजल है, कहां कितनी लवणता है, कितनी क्षारीयता है, इस पर जलगुणवत्ता मानचित्र तैयार किया गया है।
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डॉ. वेल मुर्गन के अनुसार, मानचित्र तैयार करने से पहले कहां कैसा पानी है, इसमें कौन सी फसल, किस फसल की कौन सी किस्म पैदा हो सकती है, इसका भी विस्तार से अनुसंधानिक अध्ययन किया गया है।
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ग्राउंड वाटर क्वालिटी मैप ऑफ इंडिया में कहां कौन सी फसल, कौन सी किस्म से बेहतर पैदावार ली जा सकती है, इसके लिए कृषि महकमें व किसानों के लिए गाइड लाइन भी तैयार की गई है। मानचित्र जारी होने के बाद चुनौती उसे किसानों तक शीघ्रता से पहुंचाने की भी होगी। जिसके लिए केंद्र व राज्य सरकारें, अनुसंधान संस्थान, कृषि विश्वविद्यालय आदि सभी मिलकर कार्य करेंगे। इससे देश में फसलों की पैदावार उन क्षेत्रों में भी बढ़ जाएगी, जहां इस समय पैदावार नहीं होती है या फिर बेहद कम होती है। भूमिगत जलस्तर के अध्ययन से शोध के लिए भी नए क्षेत्र मिलेंगे, जिससे किस क्षेत्र में कौन सी फसल पैदा होगी, उसके लिए नई किस्मों की ईजाद की आवश्यकता भी बढ़ेगी।
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