तरावड़ी के सरकार की अनदेखी के चलते तरावड़ी में स्थित पृथ्वी राज चौहान खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। यह एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता था जो प्रति वर्ष करोड़ों की आमदनी सरकार को देता।
इसके अंदर रह रहे लोग किले के मूल ढांचे को ही समाप्त करने का काम कर रहे हैं। किले को बचाने वाले सो रहे हैं। साफ है कि तरावड़ी की लड़ाइयों का गवाह यह किला आने वाले कुछ सालों में विलुप्त हो जाएगा।
तरावड़ी की धरती पर जहां 1191 व 1192 के दो युद्ध हुए उनका गवाह यह किला आजादी से पहले अपने असली स्वरूप में था।
बंटवारे के समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को यहां शरण दी गई और शरण देने वाले समय के साथ यह भूल गए कि यदि इन शरणार्थियों को रहने के लिए जल्द कहीं ओर स्थान न दिया गया तो किले के मूल स्वरूप को नुकसान पहुंच सकता है।
हुआ भी यही। लोगों ने धीरे-धीरे किले की दीवारों को तोड़कर वहां पक्के मकान बनाना शुरू कर दिया और आज स्थिति यह है कि किले की चारदीवारी में 70 प्रतिशत जगह बड़ी ईटें लगी हुई हैं।
किले के मुख्य दरवाजे की स्थिति ऐसी है कि वह कभी भी गिर सकता है और जिस समय गिरा तो नीचे से गुजरने वाले लोगाें के लिए खतरे का कारण बन सकता है।
खतरे को लेकर पहले भी मुद्दा उठाया जा चुका है, लेकिन दुर्घटना होने के बाद जागना शायद सरकार की आदत है। सरकार चाहे तो आज भी किले के दोनों दरवाजों की मरम्मत कर उसे विलुप्त होने से बचा सकती है।
किले को पृथ्वी राज चौहान स्मारक बनाने की मांग
पृथ्वी राज चौहान के वंशज क्षत्रिय समाज के लोग भी लगातार इसे किले में पृथ्वी राज चौहान का स्मारक बनाने की मांग करते आ रहे हैं और समाज के लोगों की मांग है कि अगर सरकार सच्ची श्रद्धांजलि पृथ्वीराज चौहान को देना चाहती है तो वह स्मारक बनाने के साथ-साथ तरावड़ी में एक बड़े कॉलेज की स्थापना करे ताकि पृथ्वी राज चौहान का नाम तरावड़ी की भूमि से जुड़ा रह सके।