फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Karnal News: सोशल मीडिया की लत से बचने के लिए दोस्तों संग बिताएं समय

विज्ञापन
विज्ञापन
- जिला नागरिक अस्पताल में रोजाना 10 प्रतिशत युवा सोशल मीडिया से तनाव, भय और चिंता से ग्रस्त होकर पहुंच रहे
विज्ञापन

संवाद न्यूज एजेंसी

करनाल। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट और यूट्यूब लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा ही नहीं बल्कि लत बन गए हैं। यहां तक कि ये प्लेटफॉर्म अब युवाओं की मानसिक स्थिति को प्रभावित करने लगे हैं। इनसे दूर रहने के लिए डॉक्टर डिजिटल डिटॉक्स थेरेपी और परिवार व दोस्तों के साथ समय बिताने की सलाह दे रहे हैं। जिला नागरिक अस्पताल में रोजाना 100 की ओपीडी में लगभग 10 प्रतिशत युवा सोशल मीडिया से अकेलेपन, तनाव, भय और चिंता से ग्रस्त होकर पहुंच रहे हैं जिनकी काउंसलिंग की जा रही है।
मनोविशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य सिंधू ने बताया कि आज अधिकांश युवा दिन का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। सुबह उठते ही सबसे पहले मोबाइल उठाकर इंस्टाग्राम स्टोरीज देखना, रील्स स्क्रॉल करना और रात को देर तक मोबाइल स्क्रीन में खोए रहना सामान्य आदत बन गई है। लेकिन यह आदत धीरे-धीरे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है। सोशल मीडिया पर लगातार परफेक्ट बॉडी, लग्जरी लाइफस्टाइल, ट्रेडिंग फैशन और सफलता की कहानियां देखने के कारण युवा खुद की तुलना दूसरों से करने लगते हैं। इससे उनमें आत्म संदेह, हीन भावना और आत्म-सम्मान की कमी देखने को मिल रही है। मन की यह स्थिति धीरे-धीरे तनाव, चिंता और डिप्रेशन का रूप ले रही है।
विज्ञापन


15-30 सेकेंड के इन मनोरंजन वीडियो के लगातार उपभोग से दिमाग को तुरंत डोपामिन मिलती है। धीरे-धीरे यही डोपामिन की लत बन जाती है। जिससे हर 30 सेकेंड में लोगों का मन बदल रहा है। वे एक पल में खुश तो दूसरे ही पल में तनाव और उदासी से भर जाते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे और किशोर भी इस लत के शिकार हो रहे हैं। उनकी एकाग्रता कमजोर हो रही है और नींद की गुणवत्ता घट रही है।
विज्ञापन


तनाव व अकेलेपन की बढ़ रही समस्या

मनोविशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य सिंधु ने बताया कि ये प्लेटफॉर्म तुरंत सुख देने वाले अनुभव तो देते हैं लेकिन दीर्घकालीन में अकेलापन, आत्म संदेह और निराशा को जन्म दे रहे हैं। रोजाना की ओपीडी में लगभग 8 से 10 प्रतिशत मरीज सोशल मीडिया एडिक्शन के आते हैं जिनमें तनाव व अकेलेपन की समस्या सबसे अधिक रहती है। लगातार स्क्रीन देखते युवा रात को देर से सोते हैं और मोबाइल के ब्लू लाइट का सीधा असर उनके स्वभाव पर दिखता है जिसमें चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी, आलस्य और शारीरिक थकान जैसे लक्षण सामने आ रहे हैं। मनोविशेषज्ञ सोशल मीडिया की लत से बचाव के लिए डिजिटल डिटॉक्स की सलाह दे रहे हैं जिसमें मरीज को कुछ दिन या शुरुआत में कुछ घंटे सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा जाता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें