संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। सोशल मीडिया ने लोगों की जीवनशैली में गहरा बदलाव किया है। एक ओर जहां लोग इसके जरिये सीख रहे हैं, जुड़ रहे हैं और काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर इसका अंधाधुंध प्रयोग व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है। जिला नागरिक अस्पताल की मनोरोग ओपीडी में रोजाना 70 से अधिक ऐसे मरीज पहुंच रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहने के कारण अवसाद, घबराहट और अकेलेपन का शिकार हो चुके हैं। इन मरीजों की काउंसलिंग के दौरान विशेषज्ञों के सामने यह बात आई है कि वर्चुअल दुनिया में सक्रिय रहने से लोग वास्तविक संबंधों से कटते जा रहे हैं।
नागरिक अस्पताल से मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य कौशिक का कहना है कि कई शोध के अनुसार, भारत में लगभग 49.1 करोड़ लोग सोशल मीडिया पर हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा 18 वर्ष से कम आयु का है। वहीं, शोध अनुसार 13 से 17 साल के 95 प्रतिशत बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट हैं, जिनमें से 35 प्रतिशत रोजाना पांच घंटे से अधिक समय वहां बिताते हैं। 18 से 22 वर्ष के युवाओं में 40 प्रतिशत ऐसे हैं, जो अपनी भावनाएं, विचार और निजी बातें सोशल मीडिया पर साझा करना पसंद करते हैं जबकि परिवार या दोस्तों से खुलकर बात नहीं करते। इससे उनमें सोचने-समझने की शक्ति कमजोर हो रही है और सामाजिक व्यवहार का दायरा सिमटता जा रहा है।
- सोशल मीडिया बढ़ा रहा भावनात्मक दूरी
डॉ. सौभाग्य के अनुसार, मोबाइल और सोशल मीडिया ने जहां लोगों को वर्चुअल रूप से जोड़ा है, वहीं भावनात्मक दूरी भी बढ़ाई है। संयुक्त परिवारों के टूटने और व्यस्त दिनचर्या ने इस समस्या को और गहरा किया है। अब लोग परिवारों में संवाद करने की बजाय मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। आर्थिक दबाव, नींद की कमी और अनियमित दिनचर्या भी डिप्रेशन को बढ़ा रही है।
- अवसाद और घबराहट कम करने के उपाय
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. संतोष का कहना है कि उनके कक्ष में हर दिन 15 से 20 लोगों की रोजाना काउंसलिंग होती है। इनमें से सोशल मीडिया के चार से पांच की काउंसलिंग होती है। इनके लिए कई सेशन होते हैं। सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने से मानसिक थकान और घबराहट बढ़ती है। परिवार के साथ चिड़चिड़ा व्यवहार बढ़ जाता है। ऐसे में व्यक्ति को अपने जीवन में संतुलन बनाना जरूरी है। इसके लिए हम उन्हें रोजाना व्यायाम करने, पौष्टिक भोजन लेने और समय पर सोने की भी सलाह देते हैं। डॉ. संतोष ने यह भी सलाह दी कि अभिभावक अपने बच्चों की निगरानी रखें और उनसे खुलकर बात करें। बच्चों को समय दें और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाएं।