संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। इंटरनेट ने जहां आम लोगों के लिए जानकारी तक पहुंच आसान बना दी है वहीं कई नीम हकीम भी पैदा कर दिए हैं। लोग गूगल से इलाज ढूंढ रहे हैं। ऐसे उपचार से बीमार और बढ़ जा रही है। सोशल मीडिया और गूगल से इलाज ढूंढ़ने की इस प्रवृत्ति को चिकित्सा की भाषा में साइबरकॉन्ड्रिया कहते हैं।
निजी अस्पताल के मनोचिकित्सक डाॅ. आशीष ने बताया कि पिछले कुछ साल में मरीजों के व्यवहार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां लोग किसी भी समस्या में सीधे चिकित्सक से परामर्श लेते थे, अब वे पहले इंटरनेट पर लक्षणों की जानकारी खोजते हैं। फिर उसी आधार पर निष्कर्ष निकाल लेते हैं। अक्सर देखा जा रहा है कि मरीज पहले से ही यह तय कर लेते हैं कि उन्हें कौन-सी बीमारी है और डॉक्टर के पास सिर्फ उसी आशंका की पुष्टि कराने जाते हैं। जब डॉक्टर उनकी बात से सहमत नहीं होते तो वे दूसरा या तीसरा चिकित्सक बदल लेते हैं।
कोरोना काल से बढ़ी समस्या
उन्होंने बताया कि मरीज सामान्य लक्षण को इंटरनेट पर देख कर गंभीर बीमारी सोचने लगते हैं जैसे सिरदर्द को ब्रेन ट्यूमर, पेट दर्द को कैंसर, दिल की धड़कन तेज होने को हार्ट अटैक और थकान को गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी इस तरह की जानकारी पढ़कर व्यक्ति मानसिक रूप से घबरा जाता है। डर और बेचैनी इतनी बढ़ जाती है कि नींद न आना, चिड़चिड़ापन और अवसाद जैसी समस्याएं भी शुरू हो जाती हैं। इन मरीजों में अधिकांश युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग शामिल हैं, जो इंटरनेट और स्मार्टफोन का अत्यधिक उपयोग करते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना काल के बाद यह समस्या और तेजी से बढ़ी है, क्योंकि उस समय लोग अस्पताल जाने से बच रहे थे और ऑनलाइन जानकारी पर ज्यादा निर्भर हो गए थे।
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साइबरकॉन्ड्रिया
मनोचिकित्सकों के अनुसार साइबरकॉन्ड्रिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति इंटरनेट पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी खोजकर खुद को गंभीर रूप से बीमार मानने लगता है। यह समस्या खासतौर पर उन लोगों में ज्यादा देखी जा रही है जो पहले से ही तनाव, चिंता या स्वास्थ्य को लेकर जरूरत से ज्यादा सतर्क रहते हैं। धीरे-धीरे यह आदत एक मानसिक विकार का रूप ले लेती है, जिसमें व्यक्ति बार-बार बीमारियों की जानकारी खोजता है और खुद को भरोसा नहीं दिला पाता।
-25 प्रतिशत मरीजों में समस्या
आजकल इंटरनेट पर स्वास्थ्य से जुड़ी अधूरी और भ्रामक जानकारी बहुत ज्यादा उपलब्ध है। मरीज बिना चिकित्सकीय ज्ञान के खुद को गंभीर बीमारी का मरीज मान लेते हैं। मनोचिकित्सा विभाग में आने वाले करीब 25 प्रतिशत मरीजों में साइबरकॉन्ड्रिया की समस्या देखी जा रही है। यह एक मानसिक स्थिति है, जिसे समय रहते समझना और नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। इंटरनेट पर पढ़ी गई जानकारी के आधार पर मरीज खुद ही जांच कराने की जिद करने लगते हैं जिनमें बार-बार ब्लड टेस्ट, सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी जांच। इन जांचों की कई बार कोई जरूरत नहीं होती, लेकिन मरीज मानसिक संतुष्टि के लिए इन्हें करवाते हैं। इससे न सिर्फ उनका आर्थिक बोझ बढ़ता है, बल्कि रिपोर्ट में कोई सामान्य बदलाव दिखने पर डर और भी बढ़ जाता है।
ध्यान रखें
-इंटरनेट को सिर्फ सामान्य जानकारी तक सीमित रखें
-लक्षण दिखने पर सीधे विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करें
-बिना सलाह जांच या दवा न लें
-बार-बार बीमारी सर्च करने से बचें
-मानसिक तनाव या डर महसूस हो तो मनोचिकित्सक से सलाह लें