राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में कार्यशाला का आयोजन
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में आयोजित दक्षिण एशिया ई-कृषि में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन का एटलस (एसीएएसए) की कार्यशाला में कृषि प्रणालियों की जलवायु अनुकूल क्षमता में सुधार करना और जलवायु संबंधी जोखिमों पर विचार किया गया। जिसमें देशभर के छह लाख गांवों में मौजूद पशुधन को जलवायु अनुकूलन प्रदान करने के लिए त्वरित योजना तैयार करने पर विचार किया गया।
कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने कहा कि एसीएएसए का उद्देश्य डेटा और साक्ष्य की गुणवत्ता गुणवत्ता, उपलब्धता और उपयोगिता को बढ़ाने में मदद करना है। यह कृषि प्रणालियों की जलवायु अनुकूलीय क्षमता में सुधार करना और जलवायु संबंधी जोखिमों को दूर करने के लिए लिंग सूचित प्रौद्योगिकी, प्रथाओं और जलवायु सूचना सेवाओं सहित स्थान विशिष्ट अनुकूलन विकल्पों पर विभिन्न हितधारकों का मार्गदर्शन करना है।
उन्होंने कहा कि इससे छोटे पैमाने के उत्पादकों की जलवायु परिवर्तनशीलता और परिवर्तन के प्रति लचीलापन बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। निदेशक ने वैज्ञानिकों से देसी मवेशियों की जलवायु परिवर्तन की संवेदनशीलता और बायो मैपिंग को समझने के लिए भी कहा।
बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया नई दिल्ली से प्रमोद कुमार अग्रवाल ने कहा कि दक्षिण एशिया के सभी देश इस क्षेत्र के लिए पशुधन विशिष्ट जलवायु जोखिम एटलस विकसित करने के लिए आईसीएआर-एनडीआरआई करनाल की ओर देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह एटलस देश के छह लाख गांवों के पशुधन क्षेत्र के जलवायु अनुकूलन योजना तुरंत तैयार करने में मदद करेगा। एनडीआरआई के संयुक्त निदेशक (शैक्षणिक) डॉ. एके सिंह ने कहा कि इस एटलस को विकसित करने के लिए आईपीसीसी द्वारा तैयार जोखिम ढांचे का उपयोग किया जाएगा।
संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. राजन शर्मा ने कहा कि देश के प्रत्येक प्रमुख पशुधन एसपीपी में जलवायु लचीलेपन को बढ़ावा देने के लिए इस एटलस के साथ एक व्यवहार्य अनुकूलन योजना विकसित की जाएगी। डेयरी विस्तार विभाग के अध्यक्ष डॉ. गोपाल सांखला ने कहा कि इस एटलस में देशी मवेशियों, संकर नस्ल के मवेशियों भेड़-बकरी, सुअर और मुर्गों पर छह परतें सुअर और मुर्गों पर छह परतें होंगी। प्रधान अन्वेषक, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संजीत माइति ने इस बात पर जोर दिया कि इस एटलस के कार्यान्वयन से पशुधन क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से संबंधित नुकसान कम हो जाएगा। पूरे दक्षिण एशिया के छोटे और सीमांत पशुधन किसानों की जलवायु लचीलेपन में सुधार होगा। कार्यशाला में देशभर के 50 वैज्ञानिक शामिल हुए।