करनाल। जो हर परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर ले उसे कहते हैं अपराजिता। ऐसी ही हैं मीरा, उनका मायका आगरा है और काम करती हैं मिट्टी और कागज से मूर्तियां गढ़ने का। नवरात्र पर गीता कालोनी की रहने वाली मीरा हांसी रोड स्थित दुकान में मां दुर्गा की मूर्तियां बनाती दिखीं तो बातचीत में बोली कि मायके में सीखी मूर्ति कला ससुराल में काम आ रही है।
मीरा ने बताया 27 वर्ष पहले करनाल के तिलक राज से विवाह हुआ था। वह बिजली का काम करते थे लेकिन परिवार बढ़ने पर कमाई पर्याप्त नहीं थी। मायके में मूर्तिकला का काम पीढ़ियों से चल रहा था। तब भाई की मदद से करनाल में मैंने काम शुरू किया। करीब दस साल के बाद पति बिजली का काम छोड़कर हमारे साथ काम में जुट गए। फिर हम मिलकर सभी प्रकार के त्योहार के लिए मूर्तियां तैयार करने लगे। परिवार में दो बेटे और एक बेटी है। अचानक 2015 में पति का देहांत हो गया। इसके बाद मूर्तिकला ने ही परिवार को सहारा दिया। बेटे कुलदीप को पेंटिंग ट्रेड से आईटीआई भी कराई है पर कारोबार में मंदी है।