अब उपभोक्ताओं को अपने हक की लड़ाई के लिए बार-बार मुकदमेबाजी में नहीं उलझना पड़ेगा। नए साल पर सरकार शिकायतकर्ता उपभोक्ताओं के लिए नया दरवाजा खोलने जा रही है। इसके लिए हर जिले में उपभोक्ताओं के लिए एक मेडिएशन सेंटर यानी मध्यस्थता सलाह केंद्र खोले जाएंगे। संभावना है कि नए साल से ही इसका शुभारंभ हो जाएगा। सरकार के इस कदम से न केवल उपभोक्ता को फायदा होगा बल्कि कोर्ट का भी बोझ कम होगा।
उपभोक्ता आयोग के प्रेजिडेंट व जज जसवंत सिंह ने बताया कि कोर्ट में मामला लंबा न खिंचे इसके लिए मध्यस्ता केंद्रों को खोला जा रहा है। उपभोक्ता एक्ट 2019 के तहत मेडिएशन सेंटर की शुरूआत की जा रही है। हर जिले में एक मेडिएशन सेंटर होगा जो कि कोर्ट या कोर्ट के आसपास ही खोला जाएगा। इस प्रक्रिया पर तेजी से काम हो रहा है। स्टाफ सिलेक्शन की प्रक्रिया भी लगभग पूरी हो चुकी है। ये सेंटर खुलने के बाद उपभोक्ता आयोग पर मुकदमों का बोझ कम होगा। कोर्ट में आए मुकदमे मेडिएशन सेंटर में भेजे जाएंगे। इस काम के लिए कुशल काउंसलर को चुना जा रहा है जो उपभोक्ता और विरोधी कंपनियों के बीच सहमति से विवादों को सुलझाने में मदद करेंगे। मध्यस्थता की कार्यवाही के लिए समय सीमा निर्धारित होगी। लगभग 21 दिन में मध्यस्थता की कार्यवाही पूरी होनी चाहिए। जबकि अगर दोनों पक्ष ईमानदारी से केस लड़ें तो कोर्ट में केस निपटने में दो से तीन महीनों का समय लग जाता है। पक्षों की लापरवाही की वजह से केस एक-दो साल लक लंबे खिंच जाते हैं। कॉपरेशन न होने से फैसलों मेें देरी होती है और कोर्ट और दोनों पक्षों का समय बर्बाद होता है।
अधिनियम 2019 के तहत उपभोक्ताओं को ये फायदे
उपभोक्ता अधिनियम 2019 के तहत सरकार ने उपभोक्ताओं को कई पहलुओं में राहत दी है। पहला उपभोक्ता कहीं भी शिकायत दर्ज करा सकेगा चाहे उसने सामान कहीं से खरीदा हो। विरोधी पार्टी को उस कोर्ट में आना पड़ेगा। दूसरा अलग-अलग क्लेम के हिसाब से शुल्क भी घटाया गया है। पांच लाख रुपए तक के मामले निशुल्क कर दिए गए हैं। 10 लाख रुपए तक के मामलों पर 200 रुपए का शुल्क लगाया गया है। 10 लाख से 20 लाख रुपए तक के मामलों पर 400 रुपए और 20 लाख से 50 लाख रुपए के मामलों पर एक हजार रुपए शुल्क लगेगा। वहीं 50 लाख से 1 करोड़ तक के मामले पर 2000 रुपए का शुल्क लगेगा।
अब तक 20621
उपभोक्ता आयोग में 1986 से अब तक 20621 मामले दर्ज किए गए हैं जिनमें से 19704 मामलों को निपटा दिया गया है। कुल 85.5 प्रतिशत मामलों को निपटाया गया है। इतने वर्षों में पहली बार कोरोना के चलते कोर्ट शांत पड़ा है। बहुत कम केस आ रहे हैं। जज तो फैसला करने के लिए तैयार हैं लेकिन एडवोकेट कोरोना के चलते कोर्ट आने से कतरा रहे हैं।