देश की सीमा की रक्षा करते हुए कारगिल युद्ध में बल्ला गांव के गुलाब सिंह ने काक्सर की चोटी पर 23 साल की उम्र में वीरगति प्राप्त की थी। शहादत में सरकार ने गांव में पुस्तकालय का निर्माण तो कराया, लेकिन वह अनदेखी का शिकार है। स्थिति यह है कि पुस्तकालय में किताबों का अभाव है और हर समय सन्नाटा पसरा रहता है। दूसरी ओर शहीद की याद में परिजन आज भी उसकी वर्दी और जूते धरोहर की तरह संजोए हुए हैं।
बल्ला गांव में साधारण किसान नंदलाल के घर में महरो देवी की कोख से 14 मार्च 1976 को जन्मे गुलाब सिंह पांच भाइयों में दो भाइयों से छोटे और दो भाइयों से बड़े थे। गुलाब सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल से की और 10वीं की परीक्षा करनाल के मेला राम स्कूल से उत्तीर्ण की। उसके बाद 1997 में बरेली में फॉर जाट रेजीमेंट में सिपाही के पद पर भर्ती हुए। प्रशिक्षण पूरा होने के मात्र दस महीने बाद कारगिल की लड़ाई के दौरान काक्सर की चौकी संख्या 5299 की चोटी पर दुश्मनों से मुकाबला करते हुए गुलाब सिंह शहीद हो गये। दुश्मनों का मुकाबला करते हुए एक गोली उनके माथे पर लगी और वे वीरगति को प्राप्त हो गये। सिर्फ तीन साल की नौकरी ही गुलाब ने पूरी की थी। शहीद के परिजन अपने लाडले की याद मेें आज भी उसकी वर्दी और जूते एक धरोहर के रूप में संजोये हुए हैं। शहीद के भाई दलबीर सिंह ने बताया कि गुलाब सिंह कारगिल की लड़ाई में करीब डेढ़ माह पहले एक रात के लिए गांव आया था। जाते समय अपने छोटे भाई को एक पैंट गिफ्ट देकर यह कह गया था कि मातृभूमि की रक्षा के लिए जंग के मैदान में जा रहा हूं। शहीद गुलाब सिंह की याद में गांव में पुस्तकालय की स्थापना की गई थी लेकिन वह अनदेखी का शिकार हो गया। सरकार की ओर से शहीद गुलाब सिंह के नाम से गांव कोहंड में शहीद के परिजनों को एक पेट्रोल पम्प मुहैया करवाया गया था। इसके साथ ही तब सरकार ने करनाल में बस स्टैंड के सामने एक दुकान देने की भी बात कही थी जो आज तक नहीं दी गई।