जातीय समीकरणों और मोदी फैक्टर के भरोसे हुई मनोहर जीत
- पंजाबी, वैश्य और ब्राह्मण मतदाताओं को साधने में कामयाब रहे पूर्व सीएम मनोहर लाल
- कमजोर संगठन और गुटबाजी का शिकार हुए कांग्रेस प्रत्याशी दिव्यांशु
देव शर्मा
करनाल। पूर्व सीएम मनोहर लाल की जीत का मुख्य आधार जातीय समीकरण और मजबूत बूथ प्रबंधन रहा है। शहरी मतदाताओं ने भी एक बार फिर भाजपा पर भरोसा जताया। इसके साथ-साथ मोदी फैक्टर का भी बड़ा असर यहां देखने को मिला। पंजाबी, वैश्य और ब्राह्मण मतदाताओं को साधने में मनोहर लाल कामयाब रहे। हालांकि कांग्रेस ने भी पंजाबी प्रत्याशी को ही मैदान में उतारा था लेकिन अनुभव की कमी, कमजोर संगठन और गुटबाजी कांग्रेस की हार का मुख्य कारण रही। इस चुनाव में मनोहर लाल ने कांग्रेस के दिव्यांशु बुद्धिराजा को हराया है।
भाजपा ने इस बार पूर्व सीएम मनोहर लाल को करनाल लोकसभा सीट से भाजपा का प्रत्याशी बनाया था। उन्होंने पूरे दमखम के साथ चुनाव भी लड़ा लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में और कुछ खास बिरादरियों में उनके प्रति नाराजगी भी दिखी। जिसने उनके सामने कड़ी चुनौती पैदा की। इसकी जानकारी भाजपा को भी थी, यही कारण रहा कि भाजपा प्रत्याशी ने अपने चुनावी कार्यक्रमों के दौरान कई बिरादरियों से जुड़े कार्यक्रम करके उन्हें साधने का प्रयास भी किया और इसी के आधार पर कुछ सांगठनिक बदलाव भी किए गए।
बिरादरियों की अलग-अलग बैठकें भी की गईं। जिसमें खासतौर पर पंजाबी बिरादरी, अग्रवाल, वैश्य समाज, ब्राह्मण, राजपूत आदि शामिल हैं। इसके साथ-साथ पिछड़ा वर्ग, जो एक बड़ा वोट बैंक भी है को साधने के लिए कई सम्मेलन व बैठकें की गईं। जिन्हें साधने में मनोहर लाल काफी हद तक कामयाब भी रहे।
इसके साथ ही भाजपा लोकसभा चुनाव की तैयारी काफी लंबे समय से कर रही थी। बूथ स्तर पर संगठनों को मजबूत किया गया था, वह चाहे बूथ प्रमुख हो, त्रिदेव हो या फिर शक्ति केंद्र प्रमुख। हर बूथ पर भाजपा ने अपना संगठन खड़ा किया था। इसके विपरीत कांग्रेस की बूथ स्तर पर कोई तैयारी नहीं थी, जिलास्तर पर भी संगठन गठित नहीं था। जिसका सीधा लाभ भाजपा प्रत्याशी को मिला और कांग्रेस को इसका सीधा नुकसान भी हुआ।
बिरादरी की बात है तो मनोहर लाल व दिव्यांशु बुद्धिराजा दोनों ही पंजाबी बिरादरी से ही थे, क्योंकि यह क्षेत्र पंजाबी बाहुल्य माना जाता है लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी पंजाबी बिरादरी में सेंधमारी में नाकाम साबित हुए। इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि मनोहर लाल इस चुनाव से केंद्रीय राजनीति में कदम रख रहे थे, चुनाव के दौरान भाजपा के जो बड़े नेता यहां आए, वह इशारों ही इशारों में ये भी बता गए थे कि यदि मनोहर लाल जीतते हैं तो उन्हें केंद्र सरकार में अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है, इसके लिए भी लोगों ने मनोहर लाल को केंद्रीय राजनीति का ये पहला मौका देना बेहतर समझा।
जहां तक शहरी और ग्रामीण मतदाताओं की बात है तो शहरी मतदाताओं ने मनोहर लाल पर अधिक भरोसा जताया। यही कारण रहा कि करनाल, घरौंडा, इंद्री, असंध आदि विधान सभाओं में मनोहर लाल को अच्छे खासे मत मिले। नीलोखेड़ी के निर्दलीय विधायक धर्मपाल गोंदर चुनाव के दौरान ही भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथी बने लेकिन इसका कोई खास असर मतदाताओं पर नहीं दिखा। ये बात सच है कि कई गांवों में भाजपा को कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी।
दूसरी ओर कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी तब घोषित किया, जब भाजपा अपने चुनाव प्रचार में जोरशोर से जुट चुकी थी, कांग्रेस प्रत्याशी की युवाओं को छोड़कर हलके में पहचान भी कम थी जबकि मनोहर लाल राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। कांग्रेस में कई स्तर पर आपसी गुटबाजी भी देखी गई, जो कांग्रेस प्रत्याशी के लिए नुकसानदायक साबित हुई।
भाजपा की जीत के प्रमुख कारण
- बूथ स्तर पर भाजपा की लंबे समय से चुनावी तैयारी काम आई।
- लोकसभा क्षेत्र में नौ में से पांच विधान सभा क्षेत्रों में भाजपा के विधायकों की मेहनत रंग लाई।
- पीएम नरेंद्र मोदी के नाम का भी मनोहर लाल को काफी फायदा मिला
कांग्रेस की हार के प्रमुख कारण
- कांग्रेस को कमजोर संगठन, आपसी मनमुटाव और गुटबाजी ने नुकसान पहुंचाया
- प्रत्याशी को देरी से घोषित किया गया, जिससे तैयारी का पूरा मौका भी नहीं मिल सका
- मुकाबला पूर्व सीएम से होना, जिनका केंद्र में मंत्री बनना तय माना जा रहा था
पिछले लोकसभा 2019 का चुनाव परिणाम -
भाजपा प्रत्याशी -संजय भाटिया - कुल मत - 911594 -वोट प्रतिशत 70.08
कांग्रेस प्रत्याशी - कुलदीप शर्मा -कुल मत -255452-वोट प्रतिशत 19.64