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Karnal News: स्कूली बसों की जांच, चालान का नहीं पता, खतरे में विद्यार्थियों की सुरक्षा

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- आठ सीटों के वाहन पर होती हैं 12 सवारी, ईद की छुट्टी के दिन भी खुले मिले कई निजी स्कूल
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- दावा- हर माह होती है 70 बसों की जांच, चालान कितने हुए पता नहीं

गगन तलवार

करनाल। जिले के ज्यादातर विद्यार्थी रोजाना घर से स्कूल तक ऐसे वाहनों में पहुंचते हैं, जो पूरी तरह से असुरक्षित हैं। इन वाहनों का सुरक्षित वाहन पॉलिसी के अनुरूप होना तो दूर सामान्य मोटर वाहन अधिनियम का भी उल्लंघन होता दिखाई देता है। हैरानी की बात ये है कि ऐसे वाहनों पर कार्रवाई करने वाले परिवहन विभाग के पास स्कूल वाहनों की जांच और चालान का कोई ब्योरा ही नहीं है।

हालांकि दावा है कि हर माह करीब 70 बसों की जांच होती है। अधिकारियों को यह नहीं पता कि कितने व किस स्कूल बस में खामी मिलने पर चालान किए गए थे। महेंद्रगढ़ में स्कूल बस हादसे में बच्चों की मौत के बाद जब अमर उजाला संवाददाता ने शहर की स्थिति की पड़ताल की तो ईद की छुट्टी के दिन भी कुछ निजी स्कूलों के खुले होने की जानकारी मिली। सड़क पर भी कई स्कूलों की बसें बच्चों को छुट्टी के बाद घर छोड़ती दिखाई दी। शिव कॉलोनी के पास आठ सीटों वाली एक छोटी वैन में भी 12 बच्चे सवार दिखाई दिए। इस वैन के बच्चे बाहर झांक रहे थे और इंडीकेटर भी टूटे थे। इसके अलावा काछवा रोड और हाईवे पार के क्षेत्र में कुछ स्कूल बसें दौड़ती दिखीं।
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जिले में करीब 450 स्कूलों की 1200 के करीब छोटी-बड़ी गाड़ियां बच्चों को लाने-लेजाने के लिए पंजीकृत हैं लेकिन फिर भी कई स्कूल संचालक मनमाने तरीके से खटारा वाहनों (टैंपो, पिकअप व थ्री व्हीलर इत्यादि) को लगाकर बच्चों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। न ही इन वाहनों को चलाने वाले चालक पूरी तरह से परफेक्ट होते हैं और न ही यह वाहन पॉलिसी के नियमों के तहत होते हैं। वहीं पंजीकृत वाहनों में भी काफी वाहन पॉलिसी के नियमों के तहत नहीं हैं। इनमें न तो महिला अटेंडेंट हैं और न ही बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से सीसीटीवी कैमरे। ब्यूरो



पॉलिसी के तहत स्कूल बसों में सुरक्षा मापदंड

- स्कूल बस पीले रंग की और उस पर नीले गहरे रंग की पट्टी अनिवार्य है। आगे सफेद चमकीली, पीछे लाल व दोनों साइडों में पीले रंग की रिफ्लेक्टर पट्टी होनी चाहिए।

- बस का परमिट, पंजीकरण प्रमाणपत्र, बीमा, प्रदूषण प्रमाणपत्र आदि दस्तावेज पूरे हों।

- चालक अनुभवी और उसके साथ महिला सहायक व एक परिचालक भी होना चाहिए।

- गति नियंत्रण करने के लिए स्पीड गर्वनर हों। बस के आगे और पीछे स्कूल बस, स्कूल संचालक, पुलिस कंट्रोल नंबर व चाइल्ड हेल्प लाइन नंबर आदि लिखे हों।

- बसों में सीसीटीवी हों, इनकी 15 दिन की रिकॉर्डिंग क्षमता होनी चाहिए। बस में जीपीएस का होना अनिवार्य है।

- चालक को कम से कम पांच साल का अनुभव होना चाहिए और इन पांच सालों में तीन बार से अधिक चालान नहीं कटा होना चाहिए।

- बच्चों की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया स्टाफ, परिचालक, महिला सहायक पूरी तरह से ट्रैंड होने चाहिए।

- ड्यूटी के समय चालक-परिचालक अपनी वर्दी में हों। कमीज पर नेम प्लेट हो। बस पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लगा होना भी जरूरी है।


डेढ़ साल पहले बनीं कमेटियां गायब

प्रदेश सरकार के निर्देश पर तीन अगस्त 2022 को जिले में एसडीएम की अध्यक्षता में उपमंडल स्तरीय कमेटियां बनाई गईं थी। इन कमेटियों ने शुरुआत में तो स्कूलों में खूब जांच की लेकिन बाद में यह कमेटियां भी गायब हो गईं। परिवहन विभाग में विशेष तौर पर निरीक्षक को सुरक्षित स्कूल वाहन पॉलिसी के तहत बसों की जांच के लिए अधिकृत किया जाता है। आरटीए निरीक्षक सुरेंद्र सैनी का कहना है कि गत सप्ताह सोमवार को स्कूल बसों की जांच की थी लेकिन अब तक चालान कितने हुए, जांच अभियान कब चला, इसकी जानकारी वे नहीं दे पाए।





हर माह स्कूल बसों की जांच करते हैं। कोई नए आदेश आएंगे तो उसका भी पालन किया जाएगा। रेंडम जांच के अलावा पासिंग पर भी जो बसें आती हैं, उनकी भी जांच करते हैं। अब फिटनेस प्रक्रिया ऑनलाइन है, यदि कोई स्कूल संचालक लापरवाही करता है तो पोर्टल पर भी जुर्माना लगता है। एसडीएम भी जांच कर सकते हैं।
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- विजय देसवाल, जिला परिवहन अधिकारी





अवकाश के दिन स्कूल नहीं खोल सकते। यदि कुछ निजी स्कूल खुले हैं तो उन्हें नोटिस देकर कार्रवाई की जाएगी। बच्चों की सुरक्षा को लेकर विभाग सजग है। पॉलिसी के तहत भी जांच कराएंगे।
- सुदेश ठुकराल, जिला शिक्षा अधिकारी
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