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Karnal News: पासिंग में देरी का जुर्माना हटा तो स्कूल संचालकों की बढ़ी लापरवाही

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- बिना फिटनेस प्रमाणपत्र दौड़ रहीं ग्रामीण क्षेत्र की 15 फीसदी बसें, पहले प्रमाणपत्र रिन्यू नहीं कराने पर 50 रुपये प्रतिदिन लगता था जुर्माना
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- सरकार ने 2021 में स्कूल संचालकों को राहत देते हुए जुर्माना लगाना किया था बंद, इसके बाद से गांवों में बस चलाने वालों ने नहीं कराई पासिंग

- प्रदेश में निजी शिक्षण संस्थानों की करीब 41 हजार बसें परिवहन विभाग के पास हैं पंजीकृत

गगन तलवार

करनाल। परिवहन विभाग की ओर से स्कूल बसों की पासिंग यानी फिटनेस प्रमाणपत्र के एक्सपायर होने के बाद रिन्यू न कराने पर लगने वाला जुर्माना जब से बंद हुआ है तभी से स्कूली बसों की फिटनेस संबंधित लापरवाही बढ़ी है। महेंद्रगढ़ में हादसे के बाद चल रही जांच में यह खुलासा हुआ है।

करनाल जिले में कई ऐसी स्कूल बस पासिंग के लिए आई हैं, जिनका पिछला फिटनेस प्रमाणपत्र तीन या चार साल पहले ही एक्सपायर हो चुका है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र की ज्यादातर स्कूल बसों के पास फिटनेस प्रमाणपत्र ही नहीं हैं। इससे बच्चों की जान को खतरे में डालते हुए ये वाहन रोजाना सफर करा रहे हैं। अब जब जांच बढ़ी तो स्कूल संचालकों ने विभाग को कुछ समय देते हुए बसों के फिटनेस प्रमाणपत्र बनवाने का समय मांगा है। जिसके तहत सरकार की ओर से भी 26 अप्रैल तक का समय दिया गया है।
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परिवहन विभाग के निरीक्षक सुरेंद्र सैनी के अनुसार, दो साल पहले स्कूल बसों की पासिंग न होने पर लगाया जाने वाला जुर्माना सरकार ने बंद कर दिया था। उस समय फिटनेस प्रमाणपत्र के खत्म होने पर यदि रिन्यू नहीं कराते थे तो 50 रुपये प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना लगता था। बाद में स्कूलों के विरोध पर विभाग ने यह जुर्माना
लगाना बंद कर दिया।

इधर, सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस माफी से लापरवाही बढ़ गई। तभी अनफिट बसें सड़कों पर दौड़ने लगी हैं। विभाग को इस जुर्माना राशि को बढ़ाना चाहिए। ताकि स्कूल संचालक समय रहते दस्तावेज भी पूरे कराएं और बसें भी नियम के अनुसार ही चलें। विदित हो कि प्रदेश भर में परिवहन विभाग के पास शिक्षण संस्थानों से संबंधित करीब 41 हजार वाहन पंजीकृत हैं। अधिकारियों के अनुसार, करीब 15 से 20 फीसदी वाहनों के पास फिटनेस प्रमाणपत्र नहीं है। ब्यूरो



पहले दिन में 79 बसों ने कराई पासिंग

करनाल में सप्ताह में एक दिन सोमवार को ही फिटनेस प्रमाणपत्र के लिए पासिंग होती है। हादसे के बाद शुरू हुई जांच में यह पहला सोमवार था जिसमें 79 स्कूल बसों ने अपनी पासिंग कराते हुए फिटनेस प्रमाणपत्र बनवाने की प्रक्रिया पूरी की। आरटीए कार्यालय में करीब साढ़े नौ लाख रुपये का टैक्स और पासिंग फीस भी जमा हुई। यही स्थिति अन्य जिलों में भी है। अब बुधवार को परिवहन आयुक्त के निर्देश पर स्कूल बसों की पासिंग के लिए विशेष शिविर लगाया जाएगा। इस दौरान भी इससे ज्यादा बसों के आने की उम्मीद है।



केवल कमाई पर है ध्यान

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ एडवोकेट संदीप राणा का कहना है कि नियम के अनुसार, प्रत्येक डीजल चलित स्कूली वाहन की 10 साल तक वैधता है, शुरुआत की चार पासिंग और प्रमाणपत्र दो साल के अंतराल में होता है, जबकि अंतिम दो फिटनेस प्रमाणपत्र एक साल अवधि के लिए ही जारी होते हैं। जबकि कुछ निजी स्कूल संचालक इस नियम का ध्यान नहीं रखते। जुर्माना लगना बंद हो गया तो उन्होंने पासिंग कराना भी बंद कर दिया। सुविधाओं के नाम पर केवल मोटी फीस लेकर कमाई कर रहे हैं। नियमों व बच्चों की सुरक्षा की ओर ध्यान नहीं है।
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वर्जन

शिक्षण संस्थानों के वाहनों का सुरक्षित स्कूल वाहन पॉलिसी के अनुरूप होना जरूरी है। स्कूल संचालक समय रहते मानकों को पूरा करें। सोमवार को हुई पासिंग में 79 स्कूली वाहन पहुंचे थे। अब बुधवार को पासिंग के लिए विशेष शिविर लगाया जाएगा।
- विजय देसवाल, जिला परिवहन अधिकारी
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