लाकडाउन में पिता की तबियत खराब होने पर बेटे एंबुलेंस को फोन करते रहे। सुबह से दोपहर तक जब एंबुलेंस नहीं पहुंची और पिता की तबियत बिगड़ती गयी तो बेटों ने रेहड़ी पर लादकर उन्हें कल्पना चावला मेडिकल कालेज पहुंचाया, जहां उपचार मिलने के बाद उनकी जान में जान आई। पिता को उपचार तो मिला लेकिन घटना ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की ओर से बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल खड़े कर दिये। विडंबना यह रही कि एंबुलेंस को फोन करने पर बार-बार घंटे डेढ़ घंटे में पहुंचने का भरोसा दिया जाता रहा, जिससे पिता की तबियत बिगड़ती चली गयी।
कोरोना संकट के बीच हुए लाकडाउन के कारण इन दिनों शहरवासी घरों में कैद हैं। प्रशासन की ओर से आवश्यक सुविधाएं घरों तक पहुंचाने के प्रयास भी किये जा रहे हैं। इस बीच रविवार की सुबह शहर की भगत सिंह कालोनी निवासी बुजुर्ग काला राम की अचानक तबियत बिगड़ गयी। उसे सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी। जब सुधार नहीं हुआ तो मेडिकल स्टोर से दवाई खरीदकर खिलाई गयी लेकिन फायदा फिर भी नहीं हुआ। ऐसे में काला राम को अस्पताल ले जाने के लिए उसके पुत्र बंटी ने एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी सहायता नहीं मिली। बंटी ने बताया कि सुबह से तीन बार एंबुलेंस को फोन किया लेकिन हर बार एंबुलेंस सर्विस के व्यक्ति ने यही कहा कि घंटे डेढ़ घंटे में एंबुलेंस पहुंच जाएगी। लेकिन जब अपराह्न तीन बजे तक भी एंबुलेंस नहीं पहुंची और पिता की तबियत बिगड़ती गयी तो परेशान दोनों बेटों ने खुद के चेहरे पर मास्क लगाया और अपने घर में मौजूद रेहड़ी पर पिता को बैठाकर कल्पना चावला अस्पताल के लिए चल दिया, जहां पहुंचने पर पिता को उपचार मिल सका। करनाल जैसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले शहर में रेहड़ी पर अपने पिता तो अस्पताल ले जाते हुए दिखी यह तस्वीर व्यवस्था पर कहीं न कहीं प्रश्न चिह्न जरूर लगाती है।