फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Karnal News: पराली के गुण मालूम हों तो किसान खुद छोड़ देंगे जलाना

विज्ञापन
विज्ञापन
- धान की पराली में छिपा मिट्टी की सेहत का खजाना, जानकारी के अभाव में किसान खुद खराब कर रहे उर्वराशक्ति
विज्ञापन

- करनाल व आसपास के जिलों की कृषि मिट्टी में 0.4 प्रतिशत से भी कम हो गया जैविक कार्बन
देव शर्मा

करनाल। विशेषज्ञों के मुताबिक हर साल देशभर में करीब 32 करोड़ टन पराली जलाई जाती है। हरियाणा और पंजाब में बड़ी मात्रा में पराली जलती है। करनाल जिले में हर साल करीब 5.50 लाख मीट्रिक टन पराली निकलती है, जिसके जलने से खेतों की मिट्टी का जैविक कार्बन निम्न श्रेणी में पहुंच गया है, यही स्थिति रही तो एक दिन किसानों के खेत सोना उगलना बंद कर देंगे। पराली जलाने के पीछे कहीं न कहीं जागरूकता की कमी है। किसानों को यदि ये मालूम हो जाए कि पराली से उनके खेतों को कितने अधिक पोषक तत्व मिल सकते हैं और वह कितने लंबे समय तक खेतों की ताकत बन सकते हैं, तो शायद किसान स्वयं ही पराली जलाना छोड़ देंगे।

कृषि भूमि में पोषक तत्वों की कमी के साथ-साथ जैविक कार्बन की कमी चिंता का विषय है, जिसकी पूर्ति पराली से हो सकती है। क्योंकि पराली नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटास, कार्बन और सल्फर जैसे तत्वों और खनिजों से तो भरपूर है ही, इसे मिट्टी में मिलने से जैविक कार्बन भी मिलता है। जैविक कार्बन, सूक्ष्म जीवों का मुख्य भोजन है, यही मिट्टी की वास्तविक जान है। इनका स्तर बढ़ने से मिट्टी की पोषक तत्वों को ग्रहण करने की शक्ति, पानी को अधिक देर तक सोख कर रखने की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि होती है और खेत की उपजाऊ शक्ति बढ़ने से लंबे समय तक खेत बेहतर फसल देने को तैयार होता है।
विज्ञापन

-

पराली न जलाने से लाभ (01 टन पराली में)
- नाइट्रोजन 6 से 6.50 किग्रा

- फास्फोरस 2 से 2.25 किग्रा
- पोटास 18 से 20 किग्रा

- कार्बन 400 किग्रा
- सल्फर 0.75 से 1 किग्रा


पराली जलाने से नुकसान

- पराली से मिलने वाले पोषक तत्व नष्ट होते हैं।
- धुएं से उत्सर्जित कार्बनडाई ऑक्साइड -1460 किग्रा।

- कार्बन मोनोऑक्साइड 60 किग्रा।
- सल्फर डाईऑक्साइड 2 किग्रा।

- जमीन के ऊपरी सतह वाले सूक्ष्म जीव मर जाते हैं।
- आग जलने से तापमान भी प्रभावित होता है।

- खरपतवारनाशकों का प्रभाव कम हो जाता है।

खेतों को उपजाऊ रखने को जैविक कार्बन बढ़ाना होगा : डॉ. नीरज
जैविक कार्बन मिट्टी (मृदा) के स्वास्थ्य का सबसे आवश्यक अंग है, जिसे मुख्यत: फसल अवशेष, हरी खाद (ढैंचा आदि) और देशी खाद के प्रयोग से ही मिट्टी में बढ़ाया जा सकता है। नाइट्रोजन, फास्फोरस आदि की तरह इसे ऊपर से खेतों में नहीं डाला जा सकता है। मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा तीन श्रेणियों में होती है, जिसमें लो श्रेणी में 0 से 0.4 प्रतिशत, मध्यम श्रेणी में 0.4 से 0.75 से प्रतिशत और उच्च श्रेणी में 0.75 से अधिक होती है। करनाल और आसपास के जिलों के खेतों की मिट्टी में जैविक कार्बन 0.4 से कम हो गया है, जो भविष्य में बेहतर खेती के लिए उचित नहीं है। हमें खेतों को उपजाऊ रखने के लिए जैविक कार्बन को बढ़ाना ही होगा।
विज्ञापन

डॉ. नीरज कुमार, वैज्ञानिक (कृषि मशीनरी एवं शक्ति), भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल



पराली जलाने से उत्सर्जित होती हैं हानिकारक गैसें : डॉ. धीर सिंह
उत्तरी राज्यों में पराली प्रबंधन चुनौती बन गया है। राष्ट्रीय स्तर पर ये राज्य खाद्य उत्पादन को बनाए रखने और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में पर्यावरण प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभाव का सामना कर रहे हैं। धान की फसल की कटाई और गेहूं की बुआई के बीच कम समय होने के कारण फसल अवशेषों को जलाते हैं, जिससे कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और नाइट्रिक ऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन होता है, जो कणीय पदार्थ, पौधों के पोषक तत्वों की हानि और वायुमंडल, पर्यावरण और मिट्टी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। देश में हर साल औसतन लगभग 30.32 करोड़ टन फसल अवशेष जलाए जाते हैं।

- डॉ. धीर सिंह, निदेशक एवं कुलपति, भारतीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) करनाल
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें