संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा माॅडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चार्तुमास के 34वें दिन महा साध्वी सुचेता महाराज ने बहुत ही मार्मिक ढंग से जन्म-मरण के चक्र पर प्रकाश डाला। भजन के माध्यम से समझाया कि मनुष्य जन्म अनमोल रे, मिट्टी में न रोल रे, अब है मिला फिर कभी न मिलेगा, कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं।
उन्होंने कहा की जन्म-मरण तो चलता रहेगा, परंतु व्यक्ति को आंतरिक युद्ध करते रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि युद्ध दो प्रकार का होता है, एक तो बाहरी युद्ध होता है जो शब्दों का या अस्त्र-शस्त्र से होता है, जिसे सारी दुनिया देख सकती है।
दूसरा युद्ध होता है अंतर्मन में। यह व्यक्ति अपने व्यसन, अपनी बुराइयों और अपने अंदर के विकारों से जीतने के लिए लड़ने की कोशिश करता है, वह आंतरिक युद्ध होता है, यह युद्ध व्यक्ति को हमेशा करते रहना चाहिए। हर व्यक्ति के अंदर पांच बुराइयां मिलती हैं, मोह, माया, क्रोध लोभ और अहंकार।
यदि व्यक्ति इन पांचों लड़ाइयाें से लड़कर जीत जाएं तो समझ लो उसका मानव जीवन का चोला मिलना सफल हो गया है। एक भजन के माध्यम से उन्होंने समझाया कि अपने जीवन के जौहरी स्वयं ही बने क्या पता फिर यह मौका मिले न मिले। समीक्षा महाराज ने समझाया कि सुख और दुख दो पांव की तरह है व्यक्ति को इनके बीच में समन्वय बनाकर चलना चाहिए।
सुख आए तो अभिमान या अहंकार में जमीन से ऊपर नहीं चलना चाहिए और दुख आए तो निराशा में हताश नहीं होना चाहिए।उन्होंने बताया कि जो मनुष्य गति है पंचेेंद्रीय वाली यह हमें बहुत भाग्य से मिली है। उन्होंने कहा कि आप परोपकार करते रहिए उसकी वापसी की अपेक्षा मत रखिए। उन्होंने बताया कि जितना ज्यादा इंसान के पास होगा उतना ही उसे विनम्र बने रहना चाहिए। भगवान बाहुबली को मोक्ष की प्राप्ति केवल इसलिए नहीं हुई थी कि उनके मन में केवल एक भाव था कि मैं अपने भाइयों को वंदना क्यों करूं।
यह अहंकार का भाव हर प्रकार का ज्ञान होते हुए भी उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होने दे रहा था जैसे ही उनके मन में यह भाव आया कि मुझे अपने भाइयों को वंदन नमस्कार करनी चाहिए उसी क्षण पर उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हो गई व्यक्ति को अपने सद्कर्मों में वृद्धि करनी चाहिए और दूसरे व्यक्ति को प्रेरणा देनी चाहिए कि वह भी संयम, प्यार, धर्म, मर्यादा और शुभ आचरण के पथ पर आगे बढ़े।