करनाल। अब पौधों की जीन एडिटिंग भी आसान होगी। गेहूं, धान, चना, सरसों सहित विभिन्न फसलों की नई लवण, क्षारीय और खारे पानी के लिए सहनशील किस्मों को विकसित करने में लगने वाला समय भी आधा हो जाएगा। इसके लिए केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल में जीनोम एडिटिंग लैब तैयार की जा रही है। संस्थान में स्पीड ब्रीडिंग फैसिलिटी लैब भी तैयार की जा रही है। इसके शुरू होने के बाद नई किस्मों को तैयार करने में लगने वाला 10 से 12 साल का समय घटकर 5 से 6 साल हो जाएगा।
सीएसएसआरआई ने अब तक लवणसहनशील, क्षारीय सहनशील गेहूं, धान, सरसों, चना जैसी फसलों की कई किस्में विकसित की है, जिसमें बासमती-की सीएसआर-30, गेहूं की केआरएल-210, केआरएल-213, सरसों की सीएस-60, 61, 62 व 64 जैसी किस्में शामिल हैं, इनसे उन लवण प्रभावित क्षेत्रों में फसलों लहलहाने लगी है, जहां एक दाना अनाज पैदा नहीं होता था। इसी शृंखला में सीएसएसआरआई ने संस्थान में करोड़ों रुपये की लागत से दो नई प्रयोगशाला का निर्माण करना शुरू किया है।
सीएसएसआरआई के निदेशक डॉ. आरके यादव ने बताया कि स्पीड ब्रीडिंग फैसिलिटी और जीनोम एडिटिंग लैब दोनों अलग-अलग प्रयोगशालाएं हैं। इन्हें पंचवर्षीय योजना के तहत मिलने वाली धनराशि से बनाया जा रहा है। स्पीड ब्रीडिंग फैसिलिटी का अनुसंधान क्षेत्र में बड़ा लाभ होगा, क्योंकि अभी कोई भी नई किस्म तैयार करने में 10 से 12 साल का समय लग ही जाता है, क्योंकि कोई भी फसल अपने सीजन में ही उगाई जा सकती है, वह भी साल में सिर्फ एक बार। उसकी फसल आने के बाद परीक्षण किया जाता है, वांछित परिणामों के लिए बार बार बोया जाता है, जिसमें 10 से 12 या उससे भी अधिक साल लग जाते हैं लेकिन इस लैब में आर्टिफिशियल मौसम तैयार किया जा सकेगा, अनुसंधान प्रयोगों के लिए एक साल में एक फसल को तीन बार भी किया जा सकेगा। जिससे परिणाम जल्दी सामने आएंगे और करीब आधे समय की बचत हो सकेगी, नई किस्म जल्दी आ सकेगी, जिसका फायदा पूरे देश को होगा।
पौधों में जीनोम एडिटिंग तकनीक बेहद महत्वपूर्ण है, इससे पौधों के जीन में बदलाव करके उनमें होने वाले रोगों को रोका जा सकेगा। उन्हें क्षारीय और खारे पानी में बेहतर पैदावार देने के योग्य बनाने में मदद मिलेगी। अन्य किस्मों में उस जीन की पहचान की जाएगी, जो रोगों से लड़ने में सक्षम है, ऐसे ही उस जीन की तलाश की जाएगी, जो लवणीय, क्षारीय और खारे पानी में फसल को उगा सकें, ऐसे जीन नई किस्म के पौधे में डाले जाएंगे। नई किस्में लवणीय, क्षारीय मिट्टी और खारे में पानी में भी बेहतर पैदावार दे सकेंगी। जिसका सीधा फायदा किसानों और देश की अर्थव्यवस्था को पहुंचेगा।
-डॉ. सतीश कुमार सनवाल, अध्यक्ष, फसल सुधार विभाग सीएसएसआरआई
दोनों की प्रयोगशाला बनकर लगभग तैयार है, उपकरण भी आ चुके हैं, अभी कुशल तकनीशियन की नियुक्ति होनी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिकों ने कार्य शुरू कर दिया है। अब तक करीब 10 करोड़ रुपये व्यय किए जा चुके हैं, इसी पंचवर्षीय योजना में भी 10 से 11 करोड़ रुपये मिलेंगे, जिनसे और कार्य आगे बढ़ेगा। - डॉ. आरके यादव, निदेशक, सीएसएसआरआई, करनाल