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09. स्वाधीनता संग्राम

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करनाल। तेवर क्रांतिकारी और विचारधारा गांधीवादी होने के चलते बाबू मूलचंद जैन को हरियाणा का गांधी भी कहा जाता है। 1931 में दसवीं की पढ़ाई के दौरान जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी के आदेश की बात सुनी तो उनके मन में आंदोलन की आग सुलग उठी। बस फिर क्या था महज 16 साल की उम्र में ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सड़कों पर उतर गए।
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उनका आंदोलन यहीं खत्म नहीं हुआ। बढ़ता हुआ कारवां अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन तक पहुंचा। ऐसे में दो बार उन्हें एक-एक साल के लिए मौजूदा पाकिस्तान के मुलतान जेल में बंद रहना पड़ा। अंग्रेजों से लंबी लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने लाहौर से कानून की पढ़ाई भी की और देश के आजाद होने के बाद ही दम लिया। उन्होंने स्वतंत्र भारत की राजनीति को नई दिशा देना के साथ-साथ सामाजिक समरसता के लिए भी काम किया। छूआछूत के खिलाफ आवाज उठाई। गरीबों व मुजारों की वकालत मुफ्त किया करते थे। आज करनाल में उनके नाम से राजकीय आईटीआई भी चल रही है। जहां लगी उनकी प्रतिमा युवाओं को देशभक्ति और गलत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करती है। ब्यूरो
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कर्मस्थली रही करनाल
बाबू मूलचंद जैन के पुत्र अशोक जैन के अनुसार, 20 अगस्त 1915 को सोनीपत के गांव सिकंदरपुर माजरा में जन्मे बाबू मूलचंद जैन की कर्मस्थली करनाल रही। 1931 में गोहाना के हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास करते ही वे सरदार भगत सिंह की फांसी होने पर हुए विरोध प्रदर्शनों में कूद पड़े। पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से उन्होंने 1935 में बीए और 1937 में प्रथम स्थान से कानून की परीक्षा पास की। फिर 1937 में गोहाना में वकालत शुरू की और गांधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। छह मार्च 1941 को उन्होंने अपने गांव सिकंदरपुरा माजरा से ही सत्याग्रह शुरू किया और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी चौधरी रणवीर सिंह हुड्डा की उपस्थिति में गिरफ्तारी दी। एक साल की सजा पाकिस्तान स्थित गुजरात जेल में काटी। 1942 में गांधी जी द्वारा छेड़े गए भारत छोड़ो आंदोलन में बाबू जी को 11 अगस्त 1942 को करनाल कचहरी में गिरफ्तार कर लिया और नजरबंद करके उन्हें पुरानी केंद्रीय जेल मुलतान पाकिस्तान भेज दिया। जहां उन्हें एक साल से अधिक रहना पड़ा। 12 सितंबर 1997 को वे प्रभु चरणों में लीन हो गए थे।
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राजनीतिक सफर :
- 1952 में पहली बार समालखा से विधायक बने और सरदार प्रताप सिंह कैरो के मंत्रीमंडल में 1956 में कैबिनेट मंत्री बने।
- 1957 में कैथल से लोकसभा सांसद चुने गए।
- 1965-67 में हरियाणा को पंजाब से अलग प्रांत बनाने के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया व आल हरियाणा एक्शन कमेटी के महासचिव बने।
-1967 में घरौंडा के विधायक बने और राव वीरेंद्र सिंह के मंत्रीमंडल में राज्य के वित्तमंत्री बने।
-1973-75 के दौरान उन्होंने लोकनायक जय प्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए आंदोनल में सक्रिय रूप से भाग लिया और हरियाणा संघर्ष समिति की कार्यकारिणी के सदस्य भी बने। 1975 में आपातकाल के दौरान 19 महीने जेल में रहे।
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-1977 में समालखा से जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बने और 1978 में चौधरी देवीलाल के मंत्रीमंडल में फिर वितमंत्री बने।
-1980-82 के दौरान राज्य में विपक्ष के नेता रहे।
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