करनाल में हुए आटा घोटाला को लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल का कहना है कि इसमें जो भी दोषी होंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का तबादला इसलिए किया जाता है, ताकि जांच प्रभावित न हो सके। एक सवाल के जवाब में सीएम ने दावा कि गंभीरता के साथ इनकी जांच की जा रही है, जांच के बाद ही आगामी फैसला लिया जाएगा।
बता दें कि करनाल में दो बार आटा घोटाले हो चुके हैं। पहले फरवरी माह में 6760 क्विंटल आटे का घोटाला किया गया था। इसमें डिपो धारकों और संबंधित अधिकारियों द्वारा बिना आटा वितरण किए ही उसे वितरित दिखा दिया गया था, जबकि हकीकत में फ्लोर मिल से आटा सेंटरों पर पहुंचा ही नहीं था। इस मामले में विभाग ने जांच के आदेश दिए थे, जिसमें 60 डिपो धारकों की सप्लाई सस्पेंड कर दी गई थी और तत्कालीन डीएफएससी कुशल बूरा को सस्पेंड कर दिया गया था। साथ ही पूरे मामले की जांच अलग से कराने के आदेश दिए गए थे। इसके बाद सीआईए की टीम ने एक चक्की से 320 क्विंटल सरकारी आटा पकड़ा गया था। इस मामले में पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई तो करीब 12 डिपो धारकों की मिलीभगत सामने आई। लेकिन आनन फानन में पहले ही डिपो धारक अदालत से अग्रिम जमानत ले आए। ऐसे में जांच ठंडी पड़ गई। हालांकि, सप्ताह पहले डीएफएससी अनिल कुमार को यहां से हटाकर जींद भेज दिया गया। उनके पास करनाल का अतिरिक्त चार्ज था।
ऐसा करनाल में क्या रखा है?
ये भी करनाल में संयोग है कि यहां पर जब भी आटा घोटाला हुआ तो संबंधित डीएफएससी पर ही कार्रवाई हुई है, इंस्पेक्टरों पर आज तक कार्रवाई नहीं हुई है। फरवरी माह में हुए आटा घोटाले में डीएफएससी कुशल बूरा सस्पेंड किए गए। इसके बाद अनिल कुमार को यहां पर भेजा गया, जबकि वे पहले भी करनाल में विवादों में रह चुके हैं। जुलाई माह में आटा घोटाला हुआ तो डीएफएससी अनिल कुमार को करनाल से हटाकर जींद भेजा गया। अब फिर से डीएफएससी कुशल बूरा को बहाल करके यहां का चार्ज सौंप दिया गया। अब सवाल है कि तमाम विवादों के बावजूद ऐसा करनाल में क्या है कि इतने घोटाले होने के बाद भी यहां पर ही अधिकारी क्यों ड्यूटी चाह रहे हैं।
एक भी जांच पूरी नहीं, केवल लटकाने की चल रही कार्रवाई
फरवरी माह में हुए घोटाले की जांच एसीएस स्तर की गई, लेकिन आज तक जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। इससे पहले विभागीय स्तर पर हुई जांच में सभी को निर्दोष बताया गया और मामले को रफा दफा करने की कोशिश की। बाद में मामला सीएम के संज्ञान में आया तो जरूर इसकी बड़े स्तर पर जांच की गई, लेकिन आज तक ये जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई नहीं की गई। दूसरा जुलाई माह में पकड़े गए फर्जीवाड़े की जांच भी फिलहाल ठंडी पड़ गई है। विभाग ने तो यहां भी कोई गड़बड़ी होने से इंकार कर दिया और अपने इंस्पेक्टरों को बचाने की कोशिश की। पुलिस ने जरूर जांच शुरू की, लेकिन यहां पर कोई डिपो धारक गिरफ्तार नहीं हो सका।
आटा बेचने के मामले की जांच चल रही है। अब तक इसमें 12 डिपो संचालकों के नाम सामने आ चुके हैं, 8 डिपो धारक जांच में शामिल हो चुके हैं। पुलिस अपनी जांच गंभीरता से कर रही है। -वीरेंद्र राणा, सीआईए-3, इंचार्ज।