माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। दो फर्जी एग्रीकल्चर सोसायटी बनाकर एग्रो एजेंसी और सरकार को लाखों रुपये का चूना लगाने का मामला सामने आया है। आरोपियों ने न केवल फर्जी सोसायटी बनाकर उधार में कृषि यंत्र खरीदे। बल्कि 80 प्रतिशत राशि का सरकार से अनुदान के लिए ऑनलाइन आवेदन किया। आरोप है कि इस बात का जब दोनों असली सोसायटी के सदस्यों को पता चला तो उनके साथ भी अनुदान की राशि हजम करने के लिए सांठगांठ कर ली। शिकायत के आधार पर पुलिस ने करीब 18 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है।
पुलिस को दी शिकायत में संजय कुमार वासी गांव करतारपुर ने बताया कि वे शक्तिमान एग्रो एजेंसी इंद्रगढ़ रोड इंद्री के प्रॉपराइटर हैं। बीबीपुर जाटान निवासी दीपक व रवि ने कैशवर एग्रीकल्चर सोसायटी व कायरा चौधरी एग्रीकल्चर सोसायटी बनाई हुई है। उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी के पीटीओ हेय रोक, रोटरी सालासर, बेल मास्टर खरीदना चाहते हैं, क्योंकि इन यंत्रों पर सरकार द्वारा अनुदान दिया जाता है। अक्तूबर 2021 में अनुदान के लिए ऑनलाइन आवेदन कराते हुए दोनों ने दोनों सोसायटियों के नाम से कुल 30 लाख रुपये का सामान लिया। इसके बाद उन्होंने कहा कि 80 प्रतिशत राशि वे अनुदान मिलने के बाद और 20 प्रतिशत पैसे बाद में अदा करेंगे।
इसके बाद 11 फरवरी को सुमित वासी गांव संधीर ने बुटाना थाना में शिकायत दी कि वे कायरा चौधरी एग्रीकल्चर सोसायटी के सदस्य हैं। उनके साथ सुमित कुमार, जितेंद्र कुमार, रविंद्र कुमार आदि भी सदस्य हैं। वहीं दूसरी सोसायटी में उनके पिता पाला राम व अन्य लोग सदस्य हैं। शिकायत में कहा कि दीपक द्वारा खरीदे गए यंत्र विक्की निवासी सीकरी के डेरे पर पड़े हुए हैं और यंत्रों की पंचिंग हो चुकी है। दीपक ने सब्सिडी लेने के लिए इन यंत्रों को उनकी फर्म से पास करवा लिया था।
इसके बाद संजय को पता चला कि दीपक व रवि का कैशवर एग्रीकल्चर सोसायटी व कायरा चौधरी एग्रीकल्चर सोसायटी से कोई संबंध नहीं है। उन दोनों ने मिलकर सरकार का नुकसान व अपने लाभ के लिए और सामान हड़पने के लिए धोखे से दोनों सोसायटी अपने नाम से फर्जी बनाई। पुलिस से कार्रवाई की मांग की है।
असली और नकली सोसायटी के लोग आपस में मिले
संजय का आरोप है कि जब सुमित कुमार ने दीपक व उनके खिलाफ शिकायत दी तो उसके बाद दीपक, रवि व सुमित कुमार सभी मिल गए और तथ्यों को छुपाकर एक-दूसरे के साथ समझौता कर लिया। उनका आरोप है कि दीपक व रवि को पता था कि चौधरी एग्रीकल्चर सोसायटी व कैशवर एग्रीकल्चर सोसायटी पहले ही बनी हुई थी। इसके बावजूद इन्हीं नामों से फर्जी सोसायटी बनाकर सामान लिया। जब इस बात का असल सोसायटी के सदस्यों को पता चला तो उनके साथ भी समझौता करके सामान अपने पास रखा। इसके बाद असल सोसायटी ने भी अपने नाम से ऑनलाइन आवेदन करते हुए सरकार से अनुदान लेने का प्रयास किया।