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Karnal News: सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल से अवसाद का शिकार हो रहे युवा

Sun, 30 Jun 2024 06:21 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
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अनुज शर्मा
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करनाल। सोशल मीडिया ने मानव जीवनशैली में अहम बदलाव किए हैं। एक ओर जहां बड़ी संख्या में लोग इसका लाभ उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसके दुष्प्रभाव का शिकार हो रहे हैं। स्थिति यह है कि जिला नागरिक अस्पताल की मनोरोग की ओपीडी में रोजाना 70 से अधिक ऐसे मरीज डिप्रेशन के पहुंच रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहते हैं। इससे वे अवसाद, घबराहट व अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। मनोरोग ओपीडी में आने वाले उक्त मरीजों की काउंसलिंग के दौरान यह बात सामने आई है।
जिला नागरिक अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनन गुप्ता बताते हैं कि एक रिसर्च में पता चला है कि 13 से 17 साल के 95 प्रतिशत बच्चों का सोशल मीडिया अकाउंट है। इनमें 35 प्रतिशत बच्चे रोजाना पांच घंटे से ज्यादा अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर सक्रिय रहते हैं। इस उम्र के बच्चे जैसे-जैसे बड़े हो रहे हैं (18 से 22 साल) वैसे-वैसे इनका सोशल मीडिया अकाउंट पर समय बढ़ता जाता है। इनमें से ही 40 प्रतिशत बच्चे अपने बातों को शेयर करने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग करते हैं। उन्हें अपने अभिभावकों, दोस्तों व जानकारों से बातें शेयर करने की बजाय सोशल मीडिया अकाउंट पर बातें शेयर करना अधिक पसंद है। ऐसे में बच्चों में सोचने-समझने की शक्ति कम हो रही है। वहीं परिवार में किस तरह से रहना है व किस से कब और कौन-सी बात करनी है। इसका अभाव होता जा रहा है। गौरतलब है कि कोरोना काल के बाद से सोशल मीडिया का प्रयोग अधिक बढ़ा है। पढ़ाई के लिए भी बच्चे सोशल मीडिया का अधिक उपयोग कर रहे हैं। संवाद
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अवसाद और घबराहट कम करने के लिए ये करें
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. संतोष ने बताया कि सोशल मीडिया पर अधिक समय देने के कारण यदि आप अवसाद और घबराहट का शिकार हो रहे हैं तो नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम करें। अपने खाने-पीने का ध्यान रखें व स्वास्थ्यवर्धक भोजन लें। स्वयं को व्यस्त रखें व मनोरंजन के अधिक साधन अपनाएं जैसे की सैर करना, अखबार, पत्रिका पढ़ना, इंडोर या आउटडोर खेल खेलना। टीवी, मोबाइल फोन व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का ज्यादा प्रयोग न करें। योग और मेडिटेशन को अपनाएं। योग दिमाग और शरीर के बीच कनेक्शन पुनर्स्थापित करने और शारीरिक मानसिक शक्ति को सुधारने में मदद करता है। रोजाना छह से आठ घंटे की नींद अवश्य लें। अभिभावक अपने बच्चों की निगरानी रखें। बच्चों से खुलकर बातें करें व उनको समय दें। उनका हौसला बढ़ाएं।
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