शहर की दुर्गा कालोनी निवासी हरियाणा हज कमेटी के कोआर्डिनेटर खुर्शीद आलम पिछले 40 वर्षों से श्रीकृष्ण कृपा के साथ जुड़कर गीता के उपदेशों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। वह गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज से जुड़े हैं। खुर्शीद बताते हैं कि करीब 40 साल पहले जब स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज सनातन धर्मसभा में एक कार्यक्रम में आए थे, तो युवक के साथ वह उनसे मिले। उनके विचारों से प्रभावित होकर उनके साथ जुड़ गया। इसके बाद गीता के उपदेशों को सुना तो उससे काफी प्रभावित हुआ। उनका कहना है कि श्रीमद्भागवत गीता और आसमानी किताब कुरान के आने के समय में भले ही अंतर हो, लेकिन शिक्षाएं एक जैसी ही हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे पार्थ हर कार्य को तू परमेश्वर को समर्पित करके कर तो वह कार्य देवतुल्य ही होगा। वही कुरान में भी इस्लाम शब्द का अर्थ ही समर्पण बताया गया है। कुरान में 30 दिन का रोजा रखने को तो कहा गया है तो गीता के दूसरे अध्याय के 59 से 72वें श्लोक को पढ़ा जाए तो रोजा या उपवास में इसकी व्याख्या मिलती है।
नहीं समझ पा रहे जीवन का मर्म
खुर्शीद कहते हैं कि आज लोग श्रीमद्भागवत गीता जैसे अद्वितीय ग्रंथ से दूर जा रहे हैं। यही कारण है कि वह जीवन का मर्म समझ नहीं पा रहे हैं। गीता सिखाती है कि हम कैसे जियें कि अमर हो जाएं। ईश्वर ने स्वयं कहा है कि जो महानता को बरकरार रखने व उसके नजदीक आने की चेष्ठा नहीं करते, वह ईश्वर को कभी नहीं जान पाते। वह नमाज, जिसे अल्लाह कबूल करेगा। इसे गीता के आठवें अध्याय के आठवें श्लोक से भी समझा जा सकता है। जिसमें कहा है कि ईश्वर से दोस्ती बनाना है तो उसके अनुकूल आचरण करना होगा।
अनंत प्रकाश ग्रहण करने का संदेश
उन्होंने कहा कि त्रेतायुग में महर्षि वशिष्ठ ने अनंत प्रकाश को ग्रहण करने की बात कही, कुरान में भी प्रकाश का ध्यान बताया गया है। सभी धर्मों का तत्व ज्ञान एक ही है। चाहे उसे किसी भी मजहब या भाषा में कहा जाए। इस बात को लोग समझ नहीं पा रहे हैं। यही कारण है कि ईर्ष्या और द्वेष की दीवार खड़ी हो रही, जो मनुष्य को पतन की ओर ले जा रही है।