क्षेत्र के औगंद गांव में चौपाल पर चुनावी चर्चा करते लोग।
निसिंग। कोरोना काल के बाद सुदूर गावों में पंचायतें अब गुलजार हो उठी हैं। चुनाव की तारीख तय होते ही चुनावी बयार बहने लगी है। हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच इस बार कौन होगा हमारा सरपंच पर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ये चौपालें चुनावी माहौल को बनाने और बिगाड़ने में काफी अहम स्थान रखती हैं। इन्हीं चौपालें में बड़े बड़े मसले हल होते हैं तो गंभीर मुद्दों पर आम सहमति पर फैसले भी लिए जाते हैं।
राज्य चुनाव आयोग ने 26 दिन का समय दिया है, नौ व 12 नवंबर को मतदान की तारीख है। इंतजार खत्म हो गया है। पंचायत चुनाव का रास्ता साफ हो गया है। चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने वालों की गतिविधियां तेज हो गई हैं। गांव की चौपालों व बैठकों में अब चौधर का डंका बजना शुरू हो गया है। ऐसे भी अब गांव में सभाएं व चौपालों में भी मंथन शुरू हो गया। पंचायती जो छोटी सरकार बनाने में अहम भूमिका अदा करती है। वहीं, प्रदेश में पंचायत चुनाव का अपना महत्व योगदान होता है। इसलिए यह चुनाव रुतबे व सियासी नींव का चुनाव भी माना जाता है। जिसको प्रत्याशी जीतने के लिए पूरी रणनीति के साथ एक-एक कदम फूंक -फूंक कर रखता है। चुनाव में चाणक्य नीति का प्रयोग कर राजनीति के दांव पेंच अजमा कर इन चुनाव में परचम लहराने का काम करता है। पिछले काफी समय से जिला परिषद, ब्लाक समिति सदस्य, सरपंच व पंच के प्रत्याशियों ने इस लंबे अंतराल में कई बार अपने अपने क्षेत्रों के लोगों से संपर्क किया। बार-बार चुनाव टलने से निराशा हाथ लगने के कारण प्रत्याशियों का इन चुनावों से मोहभंग हो गया था। लेकिन अब आस जगी है। अभी से ही प्रत्याशी बिना समय गवाएं अपना-अपना मोर्चा संभाल लिया काम कर रहे हैं और पूरी तैयारियों के साथ इन चुनाव में अपनी किस्मत को आजमा आएंगे।
औंगद गांव में भी कुछ ऐसा ही नजारा दिखा। जहां पर हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच बुजुर्ग इन प्रत्याशियों के लिए पिच बिछाने पर चर्चाएं होती दिखी। यहां बुजुर्गों ने बताया कि पुराने समय से ही वैसे तो यह चौपालें गांव की बीचोबीच होती है। जहां पर गांव के कोने कोने की सूचना एक साथ सुनाई और कहीं जाती है। गांव की चौधर किसको मिलनी चाहिए। किस जाति धर्म का प्रभाव है। जिसका गांव में विकास में योगदान होगा इत्यादि सवालों को हल करने के बाद उसके पक्ष के प्रचार-प्रसार भी किया जाता है। गांव में पंचायत का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी जितनी मेहनत और दांवपेंच का प्रयोग करते हैं। चुनाव का समय नजदीक आने पर गांव में सभाएं सुबह और शाम को तेज होने लगी है। प्रत्याशी अपने-अपने दांव लगाने के लिए बेताब है। भविष्य ही बताएगा कि गांव की चौधर का ताज किसके सिर सजेगा और इन चुनावों के बाद प्रदेश में विधानसभा चुनाव में किस राजनीतिक दल को बढ़त मिलेगी। ऐसे कई सवाल जिनका जवाब छोटी सरकार बनाने के बाद ही मिलेगा।