करनाल। कभी बिजली निगम से बिजली लेकर नट बोल्ट बनाने का प्लांट चलता था। बेटे ने कमान संभाली और नई सोच के साथ काम किया तो आज नट बोल्ट बनाने के साथ-साथ प्लांट में ही बिजली उत्पादन भी शुरू हो गया। आज अपनी उत्पादित बिजली से ही प्लांट चल रहा है। यह कहानी है कि आदित्य अग्रवाल की है, जो ऊर्जा संरक्षण के जरिए पर्यावरण को बचाने की दिशा में मिसाल के रूप में उभरे हैं।
पढ़ाई के बाद कुछ अलग करने की चाह और कठिनाई से हुई जंग के बाद आज उनका नट बोल्ट का प्लांट हैं।इस प्लांट में इस्तेमाल की जा रही बिजली गोबर गैस से बनाई जाती है। करीब छह साल पहले चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से बीसीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की जगह अपना कुछ नया करने की ठानी। आदित्य अग्रवाल ने पिता नवल किशोर अग्रवाल की 25 सालों से चल रही टीसी इंडस्ट्रीज (नट बोल्ट) एवं हरी वाय इंडस्ट्रीज (कील) की फैक्टरी को गोबर गैस से चलाने का निर्णय लिया।
कुंजपुरा स्थित फैक्टरी को चलाने के लिए उन्होंने शुरुआत में 40 टन का गोबर गैस प्लांट लगाया। जिसकी क्षमता वर्तमान में बढ़ाकर 240 टन है। 100-100 किलोवाट के दो एवं 50 किलोवाट के एक जेनरेटर से यहां रोजाना दो हजार यूनिट बिजली पैदा होती है। इससे उनकी पूरी फैक्टरी संचालित होती है। रोजाना पांच हजार किलो गैस भी तैयार हो रही है, जिसमें से दो हजार किलो गैस दूसरी फैक्टरियों को सप्लाई कर रहे हैं। इसके लिए वह शहर की गोशालाओं से गोबर लेते हैं। उनके इस प्रोजेक्ट को देखने के लिए कृषि मंत्री जेपी दलाल भी यहां आ चुके हैं।
आदित्य के इस कारनामे को देखकर स्टेट टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी ने उन्हें टेक्निकल एक्सपर्ट के रूप में अपने साथ रखा। आदित्य ने बताया कि उनका बड़ा भाई अमित अग्रवाल और छोटा भाई अनुज अग्रवाल भी इस प्रोजेक्ट में उनका साथ दे रहे हैं। उनके इस प्रोजेक्ट को देखने के लिए देश-विदेश के लोग भी आ चुके हैं। आदित्य ने बताया कि उनके पिता नवल किशोर अग्रवाल कुंजपुरा स्थित गोशाला में कोषाध्यक्ष थे। पिता के साथ अक्सर गोशाला में जाना होता था। गोशाला में एकत्रित गोबर को देखकर उनके मन में गोबर गैस प्लांट लगाने का विचार आया। वर्ष 2010 में पढ़ाई पूरी करने के बाद पिता के साथ प्रोजेक्ट को लेकर प्लान बनाया। पिता से हरी झंडी मिली तो काम को आगे बढ़ाया और करीब एक करोड़ की लागत से 800 क्यूबिक के पांच टैंक लगाए।
किसानों से लेते हैं फसल अवशेष
आदित्य किसानों से फसलों के बचे हुए फसल अवशेष लेते हैं और बदले में उन्हें गोबर की खाद देते हैं। जिससे किसानों के फसल अवशेषों का उठान भी होता है और उन्हें सस्ती दर पर जैविक खाद भी मिल जाती है। वह किसानों को तरल और ठोस दो प्रकार की खाद उपलब्ध करवाते हैं। दो जनरेटर 100-100 किलोवाट के लगाए गए हैं और एक 50 किलोवाट का जनरेटर बैकअप के लिए रखा है। गोबर गैस से दोनों जेनरेटर चलते हैं। फैक्टरी का पूरा कार्य यहीं उत्पादित बिजली से होता है और बाहर से किसी प्रकार की बिजली नहीं ली जाती।