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गरिमा, पूर्णिमा के बाद अब ‘लालिमा’

Tue, 03 Jun 2014 12:13 AM IST
अमर उजाला/ब्यूरो, करनाल
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गरिमा और महिमा के बाद अब राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने मुर्राह नस्ल की दुधारू भैंस से एक क्लोन कटड़ी को तैयार किया है, जिसे ‘लालिमा’ नाम दिया गया है।
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लालिमा को एक महीने तक बेहद कड़ी निगरानी में रखा गया और सोमवार को इसे बाहर निकाल दिया गया है। दो मई को तैयार की गई यह क्लोन कटड़ी खूब उछल कूद कर रही है। एनडीआरआई के डायरेक्टर डॉ. एके श्रीवास्तव ने इसे सबके सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि लालिमा का जन्म सामान्य प्रसव से हुआ है और जन्म के समय इसका वजन 36 किलो था।

नवजात क्लोन स्वस्थ अवस्था में है और उसका वर्तमान वजन 42 किलो है। उन्होंने इसे संस्थान की एक उत्कृष्ट दुधारू भैंस से बनाया है। जिन वैज्ञानिकों को लालिमा के जन्म का श्रेय जाता है उनमें डॉ. एसके सिंगला, डॉ. एमएस चौहान, डॉ. आरएस माणिक, डॉ. पी पलटा, डॉ. शिव प्रसाद और डॉ. बसंती ज्योत्सना शामिल हैं।
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 क्लोनिंग तकनीक का प्रयोग करके डेरी में दो तरह से श्रेष्ठ जर्म प्लाज्मा का गुणन किया जा सकता है। एक सांड़ के क्लोन कटड़ों का और दूसरा अधिक दूध देने वाली भैंसों की क्लोन कटड़ियों का।

लालिमा की मां का रिकार्ड
लालिमा को पैदा करने के लिए जिस मुर्राह नस्ल की भैंस से कोशिकाएं ली गई हैं, उसने 305 दिन में तीसरे सामान्य दुग्ध-लवण (लैक्टेशन) में 2713 किलो दूध दिया। उसने 471 दिन की अवधि में 3494 किलो दूध दिया। लालिमा सामान्य गर्भकाल के बाद किसी डॉक्टर की सहायता के साधारण प्रसव से एवं सामान्य वजन के साथ पैदा हुई।

महानिदेशक ने दी बधाई
एनडीआरआई करनाल के वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि पर आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एस अयप्पन ने टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह वयस्क दूध देने वाले पशुओं से क्लोन बनाने की तकनीक हमें आबादी बढ़ने की वजह से दूध की बढ़ती हुई मांग की चुनौती का सामना करने में सहायक होगी। एनडीआरआई के निदेशक डॉ. एके श्रीवास्तव ने कहा कि यह तकनीक उत्कृष्ट दूध देने वाली भैंसों का गुणन करने में बहुत उपयोगी है। उन्होेंने कहा कि यद्यपि दुनिया में भैंसों की सबसे ज्यादा आबादी भारत में है और वे कुल दूध उत्पादन में 55 प्रतिशत योगदान देती है, लेकिन फिर भी हमारे देश में उत्कृष्ट भैंसों की संख्या बहुत कम है। इसलिए उत्कृष्ट भैंसों की संख्या बढ़ाना अति आवश्यक है।


पहली दो क्लोन कटड़ियों की हो गई थी महीने में मौत
लालिमा क्लोन कटड़ी का जन्म एनडीआरआई के वैज्ञानिकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। इससे पहले गरिमा-1 और पूर्णिमा की जन्म के महीने भीतर मौत हो गई थी। लिहाजा लालिमा के समय में वैज्ञानिक वह सारी एहतियात बरत कर चल रहे थे, जो पहली दोनों क्लोन कटड़ियों के समय में रह गई थी। लालिमा के बारे में सबसे खास बात यह है कि यह वयस्क भैंस के कान के टिश्यू से बनाई गई पहली कटड़ी है। हालांकि इससे पहले पूर्णिमा कटड़ी को भी वयस्क पशु से बनाया गया था, लेकिन वह महज 21 दिन ही जीवित रह सकी थी। लालिमा के रूप में वैज्ञानिकों की यह भी एक बड़ी उपलब्धि है।

क्लोनिंग का पांच साल का रिकार्ड
एनडीआरई के वैज्ञानिकों ने दो फरवरी 2009 को सबसे पहले क्लोन कटड़ी तैयार की, जो महज 12 दिन ही जीवित रही। इसके बाद छह जून 2009 को गरिमा-1 कटड़ी को बनाया गया, जो दो साल दो महीने तक जीवित रही। 22 अगस्त 2010 को गरिमा-2 बनाई गई, जिसने 25 जनवरी 2013 को महिमा को जन्म दिया। गरिमा-2 वैज्ञानिकों के लिए अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में 11 से 12 किलोग्राम दूध प्रतिदिन देती है। इसके बाद वर्ष 2013 में वयस्क भैंस की कोशिकाआें से पूर्णिमा का जन्म हुआ, लेकिन वह 21 दिन मर गई। अब लालिमा को जन्म दिया गया है, जो एक महीने की हो चुकी है और वैज्ञानिक इसे लेकर आशान्वित है।

गरिमा-2 बनी थी स्टेम सेल से
एनडीआरआई के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. एमएस चौहान ने बताया कि गरिमा-2 क्लोन कटड़ी को भैंस के स्टेम सेल से बनाया गया था। लालिमा ऐसी पहली कटड़ी है, जिसे वयस्क भैंस से बनाया गया है। गरिमा-1 और पूर्णिमा की मौत ने उनके सामने चुनौती खड़ी कर दी थी। वैज्ञानिकों ने एक साल की कड़ी मेहनत के बाद लालिमा को बनाने में कामयाबी हासिल की।
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