संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा माॅडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 24वें दिन प्रवचन के दौरान महा साध्वी सुचेता महाराज ने बाल दिवस मनाते हुए बच्चों को संस्कार देने पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने फरमाया कि जीवन एक पाठशाला है। इसमें हम जैसी पढ़ाई करते हैं, जीवन हमारा वैसे ही बन जाता हैं। तो जीवन को संस्कारमय कैसे बनाएं।
उन्होंने कहा कि महापुरुषों ने तीन प्रकार के पिता का वर्णन किया है। पहले वो जो की अधम होते हैं जो बच्चे को भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं। दूसरे पिता वो होते हैं जो अपने बच्चे को सुविधाएं देते है संस्कार नहीं देते, वह मध्यम होते हैं। तीसरे प्रकार के वो होते हैं जो अपने बच्चों को संस्कार देते हैं वो उत्कृष्ट होते हैं।
संस्कार मॉल में नहीं माहौल में मिलते हैं। हमारे जीवन की वर्णमाला कैसी होनी चाहिए? जैसे हम लौकिक पढ़ाई में वर्णमाला को सीखते हैं, उसको सीखे बिना हमारी पढ़ाई अधूरी है। उसी प्रकार अगर हम अपने जीवन में संस्कार रूपी वर्णमाला नहीं सीखते तो हमारे संस्कार अधूरे हैं। आज व्यक्ति बच्चों को कार तो देते हैं लेकिन संस्कार नहीं।
हमें बच्चों के जीवन में कार नहीं नवकार मंत्र देना चाहिए। तभी बच्चे संस्कारवान, आदर्शवान बन सकते हैं। सभी जैन धर्मानुयायियों के बच्चों ने बढ़ चढ़कर धर्म शिक्षा में भाग लिया। उन्होंने अपने धर्म, अपने इतिहास और अपने तीर्थंकरों के बारे में विस्तार से जानकारी ग्रहण की।
बहुत से बच्चे आज के माहौल में धर्म का प्रचार प्रसार न होने के कारण बहुत सी बातों से अनभिज्ञ थे। उसके बाद उन्होंने अपने जीवन में कुछ निश्चित समय प्रतिदिन धर्म को देने का वायदा करते हुए महासाध्वी के चरण स्पर्श किए। जैन समाज ने भी धर्मगुरुओं द्वारा बच्चों को दिए गए धर्म प्रचार व धर्म संस्कार के लिए शुक्रिया अदा किया।