संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। होली का नाम लेते ही आज रंगों के पैकेट, डीजे की धुन और बाजार की रौनक आंखों के सामने आती है। पुराने जमाने में होली का उल्लास अलग ही था। सब घर का होता था। रंग टेसू के फूलों से बनाते थे। मिठाई भी घर पर ही बनी होती। गुझिया, बेसन के सेव और उनको गुड़ से बांधकर बनाए गए लड्डू। बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि होली का त्योहार पूरे गांव का एकत्र होने का खास दिन हुआ करता था। होली के दो दिन पहले से फाग के गीत गाए जाते थे। बुजुर्ग महिलाओं की यादों में आज भी वह होली जीवंत है।