करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ ब्याज की मांग वाली एक याचिका को खारिज कर दिया। आयोग ने माना कि बीमा कंपनी की ओर से सेवा में कोई कमी नहीं थी। जांच में सामने आया कि शिकायतकर्ता ने बीमा कंपनी की ओर से मांगे गए दस्तावेज देने में खुद देरी की थी। इस कारण ही दावा की राशि मिलने में देरी हुई।
आयोग के फैसले के अनुसार, नीलोखेड़ी तहसील के संधीर गांव निवासी रजनी ने उपभोक्ता आयोग के समक्ष शिकायत दायर की थी। रजनी ने बताया कि उनके स्वर्गीय पति नरेश कुमार ने टाटा एआईजी से एक्सीडेंटल शील्ड पॉलिसी ली थी। इसमें 25 लाख रुपये का बीमा कवर था। 27 जनवरी 2020 को एक दर्दनाक दुर्घटना में नरेश कुमार की आटा चक्की की बेल्ट में कपड़े फंस जाने के कारण मौत हो गई थी।
इसके बाद शिकायतकर्ता रजनी ने बीमा दावे की प्रक्रिया शुरू की। शिकायतकर्ता के अनुसार, बीमा कंपनी ने चार साल की देरी के बाद केवल बीमित राशि 25 लाख रुपये का भुगतान किया और इस अवधि का कोई ब्याज नहीं दिया। इसके बाद रजनी ने आयोग का रुख करते हुए मांग की कि 27 जनवरी 2020 से 30 मार्च 2024 तक की अवधि के लिए 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर से 12 लाख 53 हजार 425 रुपये का भुगतान किया जाए। वहीं मानसिक उत्पीड़न और परेशानी के मुआवजे के रूप में एक लाख रुपये दिए जाएं।
बीमा कंपनी का पक्ष
बीमा कंपनी के वकील ने आयोग के समक्ष कहा कि दावा मिलने पर उन्होंने तुरंत एक स्वतंत्र जांचकर्ता नियुक्त किया था और दावे की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक दस्तावेज मांगे थे। कंपनी का तर्क था कि देरी शिकायतकर्ता की ओर से दस्तावेज और औपचारिकताएं समय पर पूरी न करने के कारण हुई थी। औपचारिकताएं पूरी होते ही बीमित राशि का 30 मार्च 2024 को पूर्ण भुगतान कर दिया गया था। पॉलिसी की शर्तों के अनुसार बीमित राशि पर ब्याज देने का कोई प्रावधान नहीं था।
आयोग का निर्णय
उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह, सदस्य नीरू अग्रवाल और सर्वजीत कौर ने मामले की सुनवाई करते हुए तथ्यों और सबूतों की समीक्षा की। आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने 30 जुलाई 2021 को पत्र भेजकर शिकायतकर्ता से कई आवश्यक दस्तावेज और स्पष्टीकरण मांगे थे। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ता ने ये औपचारिकताएं बिना किसी देरी के पूरी कर दी थीं।
आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि बीमा औपचारिकताएं पूरी होने के बाद कंपनी ने पूरी राशि का भुगतान कर दिया था। इन आधारों को देखते हुए आयोग ने माना कि बीमा कंपनी की ओर से कोई लापरवाही या सेवा में कमी नहीं हुई है और 21 जुलाई 2026 को दिए गए आदेश में इस शिकायत को खारिज कर दिया गया।