- पिता की तालाबंदी को भेद 1990 में 16 साल की उम्र में अयोध्या पहुंचे थे विश्व हिंदू परिषद के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य
- कारसेवकों को पकड़ने के लिए पुलिस के जय श्री राम कोड को भी दिया चकमा, 15 किलोमीटर भागकर जन्मभूमि पहुंचे
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। वर्ष 1990 में भगवान राम के नाम का जोश ऐसा था कि पिता की तालाबंदी भी 16 साल के किशोर को अयोध्या जाने से नहीं रोक पाई। परिवार को चकमा देकर भागे बेटे की जब गोली लगने से मौत की खबर मिली तो घर पर गम का माहौल हो गया। पिता ने हिम्मत जुटाकर बेटे का शव लाने के लिए जैसे ही घर से बाहर कदम रखे तो देखा कि बेटा खुद पैदल चलकर घर आ रहा है। यह कहानी है विश्व हिंदू परिषद के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य चंद्रवीर भाटिया की। जिन्होंने 1990 और 1992 में अयोध्या जाकर कारसेवा की थी।
1990 में उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश पर पुलिस भी मंदिर के लिए पहुंचने वालों को पकड़ने के लिए मुस्तैद थी, लेकिन करनाल का यह नन्हा भक्त मंदिर पहुंच गया और भगवान के दर्शन किए। 1992 में जब ढांचा टूटा था तो उनके साथ करनाल से जुगल बठला, वर्तमान में सीएम के प्रतिनिधि संजय बठला और उमेश चानना भी सेवा में गए थे। 2020 में मंदिर की नींव रखने के अवसर पर उन्होंने जिले के ऐतिहासिक धर्म स्थलों की मिट्टी और जल एकत्रित करके अयोध्या भेजा था, अब मंदिरों में कलश स्थापना की सेवा की। प्राण प्रतिष्ठा के शुभ अवसर पर चंद्रवीर भाटिया ने उन दिनों के संघर्ष की कहानी को अमर उजाला के साथ साझा किया है। पढ़िए उन्हीं की जुबानी...
जय श्रीराम बोला, तो 65 में से 62 लोग हो गए गिरफ्तार
1990 की बात है। लाल कृष्ण अडवानी देश में रथ यात्रा निकाल रहे थे। साथ ही विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल भी देशभर में हिंदू सम्मेलन कर रहे थे। 30 अक्तूबर 1990 को राममंदिर के लिए कार सेवा करने का दिन तय किया गया था। जिसे सरकार ने रोकने का प्रयास किया। हर रामभक्त को गिरफ्तार किया जा रहा था। मैं तब करनाल में संघ से जुड़ा हुआ था, वहीं से मंदिर के लिए निकलने का जोश उमड़ा।
पिता जी चिंतित थे, तो उन्होंने घर पर ताला लगाकर मुझे बंद कर दिया, छत से कूदकर घर से भागकर दिल्ली पहुंचा। यहां पश्चिम विहार क्षेत्र से 65 लोग अयोध्या के लिए निकले। लखनऊ तक ट्रेन से पहुंच गए, यहां पुलिस ने उतार लिया। बस में बैठकर बाराबंकी पहुंचे तो रास्ते में तीन-चार बिना वर्दी वाले पुलिसकर्मी बस में चढ़े। उन्होंने जय श्री राम का नारा लगाया, जिन्होंने इसके जवाब में जय श्री राम बोला उनको गिरफ्तार किया गया। इस तरीके से हमारे समूह के 65 में से 62 लोग गिरफ्तार हो गए। ...जैसा चंद्रवीर भाटिया ने बताया।
हाजिरी के समय नहीं थे तो शहीद मान घर भेजा संदेश
चंद्रवीर ने बताया कि 30 अक्तूबर को वे अयोध्या तुलसी स्मारक में रुके थे। जहां समूह की रोजाना हाजिरी लगती थी ताकि पता चले कोई भागा या पुलिस के हत्थे तो नहीं चढ़ा। हाजिरी के समय वे वहां नहीं थे तो उन्हें मृत मानकर खबर करनाल भेज दी गई, लेकिन वे पुलिस की पिटाई में घायल हो गए थे। दरअसल, जन्म स्थान के नजदीक भीड़ के ऊपर से हैलीकॉप्टर गुजरा तो इसके बाद पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दी। जिस भीड़ में वे थे, वहां भी लाठीचार्ज हुआ था। इस दौरान पिटाई से वे बेहोश हो गए। वहां से संत उठाकर अपने आश्रम ले गए। 16 घंटे बाद जब होश आया तो इसी आश्रम से दो नवंबर को दोबारा आंदोलन शुरू कर दिया। इतने में तुलसी स्मारक से उनके घर पर उनकी मौत होने का संदेश भेज दिया था। वे चार नवंबर को करनाल पहुंचे थे।