संवाद न्यूज एजेंसी
इंद्री। गांव जोहड़ माजरा में मौजूद प्राचीन टीले से प्राचीन ईंटे, मानव कंकाल, मृदभांड, खिलौने के साथ अन्य सामान मिला है। करीब 50 एकड़ में फैले इस टीले से प्राचीन अवशेष मिलने की सूचना पर कृष्ण संग्रहालय कुरुक्षेत्र की टीम ने पहुंचकर साक्ष्य जुटाए। यह अवशेष किस काल का है, इसकी जांच चल रही है। टीम में इतिहासकार और पुरातत्ववेता डॉ. राजेंद्र राणा और श्री कृष्ण संग्रहालय कुरुक्षेत्र के इंचार्ज बलवान सिंह शामिल थे।
उन्होंने यहां ग्रामीणों के साथ कुछ जगह खोदाई कर मृदभांड के टुकड़े, खिलौने और ईंटें एकत्रित की। टीम को मौके से एक बैल के आकार का मिट्टी का खिलौना भी मिला, जिसे अपने साथ रख लिया। डॉ. राजेंद्र राणा ने बताया कि यह काफी बड़े क्षेत्र में फैली पुरातात्विक साइट है। पहली नजर में यहां जो सामान मिला है, यह राजपूत काल का हो सकता है। बर्तनों की बनावट और ईंटों के आकार से इसे एक से 1500 साल पुराने होने की संभावना है। कुछ मिट्टी के बर्तनों पर लाल रंग की चित्रकारी हुई है।
उन्होंने कहा कि खुदाई वाले स्थान पर जमीन के नीचे रेत भी निकली है, जिससे यह लगता है कि कभी यहां से यमुना का प्रवाह रहा होगा। ईसा की पहली और दूसरी शताब्दी में यमुना के पास के जो स्थान थे, वे के व्यापार मार्ग थे। उस समय चीन से जो व्यापार होता था, उसे सिल्क रूट कहा जाता है। उन्होंने कहा कि यह टीला बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। ऐसे में कई बार इसके अन्वेषण की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यहां जो ईंटें मिली हैं, वह पांच सेंटीमीटर मोटी 31 सेंटीमीटर लंबी और 21 सेंटीमीटर चौड़ाई की है। इसके अलावा जो कसोरे मिले हैं, उनका किनारा चाकू की नोक जैसा है। जो इसे एक हजार से 1500 वर्ष पुराना होना बताती हैं।
आर्य थे भारतीय मूल निवासी
डॉ. राजेंद्र राणा ने बताया कि राखी गढ़ी गांव में मिले कंकालों के डीएनए टेस्ट के आधार पर यह साबित होता है कि आर्य बाहर से नहीं आए, बल्कि यहीं के मूल निवासी थे। उनका यूरोप अथवा किसी अन्य देश के लोगों से डीएनए मैच नहीं करता है। भारतीय डीएनए एक ही है।
राजपूत काल के हो सकते हैं अवशेष
कृष्ण संग्रहालय कुरुक्षेत्र के इंचार्ज बलवान सिंह ने कहा कि पुरातात्विक साइट से मिले सामान के आधार पर इसे राजपूत काल का कहा जा सकता है। जो ईशा की पहली शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक था। ग्रामीणों के अनुसार सैकड़ों वर्ष पहले यहां एक गांव गर्क (नष्ट) हुआ था। जिसकी निशानियां आज भी टीले के नीचे मौजूद है। यह गांव कैसे नष्ट हुआ इसका खुलासा होना अभी बाकी है।