खतरनाक है फोबिया : नॉक्टिफोबिया
अंधेरे का डर बच्चों को ही नहीं, बड़ों में भी बढ़ रहा
अंधेरा होते ही बेचैनी बढ़ जाना, अकेले कमरे में डर महसूस होना या सोते समय लाइट बंद करने से घबराना, ये लक्षण हैं नॉक्टिफोबिया के। अंधेरे का डर सिर्फ बच्चों को ही नहीं, बल्कि बड़ों में भी तेजी से बढ़ रहा है। तेज रफ्तार जीवन, तनाव और ट्रॉमा नॉक्टिफोबिया के मरीजों की संख्या को बढ़ा रही हैं। जिला नागरिक अस्पताल की ओपीडी के आंकड़ों के अनुसार, हर महीने 25 से 30 मरीज अंधेरे से जुड़ी घबराहट, नींद न आने और घबराने की समस्या लेकर आते हैं। मरीजों को घबराहट के दौरे भी पड़ते हैं। मरीजों में 10 से 18 वर्ष के किशोरों की संख्या अधिक है। हाल के वर्षों में 30 से 40 वर्ष के युवा भी बड़ी संख्या में सामने आए हैं। कई मामलों में यह डर किसी पूर्व घटना, खतरे की कल्पना या बचपन के नकारात्मक अनुभव से जुड़ा पाया गया है। डॉक्टरों का कहना है कि यह फोबिया अक्सर नींद से जुड़ी समस्याओं और मानसिक तनाव को बढ़ाता है।
लक्षण
- अंधेरे में बेचैनी या घबराहट बढ़ जाना। सोते समय लाइट बंद नहीं करना। शरीर कांपना या पसीना आना। अंधेरे कमरे में जाने से डरना। रात में बुरे विचारों का आना।
बचाव
- धीरे-धीरे कम रोशनी में रहने का अभ्यास करें। स्लीप हाइजीन अपनाएं। सही समय पर सोना, अनुकूल वातावरण आदि। बुरी घटनाओं से जुड़ी यादों के संबंध में काउंसिलिंग लें। परिवार का भावनात्मक सहयोग दिया जाए।
नॉक्टिफोबिया अब सिर्फ बचपन की बीमारी नहीं रह गई है। तनावपूर्ण जीवनशैली इस बीमारी के मरीज बढ़ा रही है। सही काउंसिलिंग और व्यवहार थेरेपी से ज्यादातर मरीज कुछ हफ्तों में सामान्य नींद और जीवनशैली अपनाने लगते हैं। -डॉ. सौभाग्य कौशिक, मनोरोग विशेषज्ञ, जिला नागरिक अस्पताल