राजेंद्र राणा
जुंडला। करवा चौथ का नाम आते ही सुहागिन महिलाओं के व्रत, चांद के दीदार और पति की लंबी उम्र की कामना की तस्वीर सामने आती है। करनाल जिले के तीन गांवों गोंदर, औंगद और कतलाहेड़ी में चौहान गोत्र की बहुओं के लिए इस पर्व से जुड़ी परंपरा अलग है। चौहान गोत्र के कई परिवारों की बहुएं पीढ़ियों से करवा चौथ का व्रत नहीं रखतीं। इसकी वजह करीब 600 साल पुरानी लोककथा बताई जाती है। यह कथा सती अमृत कंवर से जुड़ी है।
अगोंध निवासी सुखबीर सिंह राणा के अनुसार, कथा की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसे स्थानीय लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता के रूप में देखा जाता है।
उन्होंने बताया कि स्थानीय लोककथा के अनुसार, करीब छह सौ साल पहले राहड़ा गांव की अमृत कंवर का विवाह गोंदर गांव के बीरपाल राणा से हुआ था। विवाह के बाद अमृत कंवर अपने ससुराल में रहने लगीं। एक बार करवा चौथ के आसपास वह मायके गई थीं। इसी दौरान उन्हें सपना आया कि उनके पति की हत्या कर दी गई है। शव बाजरे की गठरियों के नीचे छिपा दिया गया है।
अमृत कंवर घबराकर अपने ससुराल पहुंचीं। वहां उन्हें पति की मृत्यु की जानकारी मिली। लोककथा के अनुसार, उन्होंने ग्रामीणों को सपने में दिखाई दी जगह के बारे में बताया। जब उस स्थान की जांच की गई तो वहां उनके पति का शव मिला।
प्रचलित कथा के अनुसार, पति की मृत्यु से दुखी अमृत कंवर ने उनके साथ सती होने का निर्णय लिया। लोकमान्यता कहती है कि सती होने से पहले उन्होंने गांव की महिलाओं से करवा स्वीकार करने का आग्रह किया था लेकिन महिलाओं ने इसे स्वीकार नहीं किया।
कथा के अनुसार, सती होने से पहले अमृत कंवर ने कहा था कि भविष्य में गांव की चौहान गोत्र की कोई बहू करवा चौथ का व्रत रखेगी तो उसके सुहाग पर संकट आएगा। तब से करवा चौथ का व्रत नहीं रखा जा रहा। संवाद
गोंदर से औंगद और कतलाहेड़ी तक पहुंची परंपरा
स्थानीय विवरणों के अनुसार, गोंदर से अलग होकर औंगद और बाद में कतलाहेड़ी गांव बसे। इन गांवों के कुछ परिवारों का संबंध गोंदर के पुराने वंशजों से माना जाता है। इसी पारिवारिक जुड़ाव के कारण सती अमृत कंवर से जुड़ी मान्यता इन गांवों में भी पहुंची। आज भी इन गांवों के कुछ चौहान गोत्र परिवारों में विवाह करके आने वाली बहुएं करवा चौथ का व्रत नहीं रखतीं। हालांकि यह परंपरा गांव के हर परिवार पर लागू नहीं होती।
बेटियां दूसरे गांवों में जाकर रखती हैं व्रत
इस परंपरा का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन गांवों की बेटियां विवाह के बाद दूसरे गांवों में जाकर अपने नए परिवार की परंपरा के अनुसार करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं।