अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। मलेशिया में आयोजित एशिया पेसिफिक मास्टर्स गेम्स में श्यामगढ़ के मुलतान ने दो ब्रांज मेडल जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। विदेशी धरती पर पहली बार मैदान में उतरे। श्यामगढ़ गांव के बुजुर्ग एथलीट ने हैमर थ्रो व डिस्कस में यह मुकाम हासिल किया। करनाल में लौटने पर 70 साल के बुजुर्ग का जोरदार स्वागत हुआ।
करनाल के तीन खिलाड़ियों ने कुल सात मेडल इस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जीते। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तक पहुंचने के लिए मुलतान ने कड़ी मेहनत की। उसका संघर्ष युवा पीढ़ियों के लिए मिसाल से कम नहीं है। मुलतान ने दिखा दिया कि जज्बा हो तो उम्र मंजिल में बाधा नहीं बन सकती है। मुलतान ने अमर उजाला से अपने अनुभव साझा किए। बताया कि पारिवारिक मजबूरियों की वजह से बचपन में खेल छूट गया। 67 की उम्र में फिर से खेलना शुरू किया। अब तक राष्ट्रीय स्तर पर भी चार गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। मुलतान शॉटपुट, हैमर थ्रो व डिस्कस थ्रो के जादूगर से कम नहीं हैं।
गांव के स्कूल में तैयार किया ट्रैक, बेटे को बनाया एथलीट
मुलतान सिंह बचपन में एथलेटिक्स में स्टेट तक खेले। आर्थिक तंगी के कारण खेल छोड़ना पड़ा, लेकिन मन में टीस थी। बेटे को एथलीट बनाने के लिए गांव के राजकीय स्कूल में हैमर थ्रो व डिस्कस थ्रो का ट्रैक बनवाया। बेटे गुरदेव को खुद एथलेटिक्स की बारीकियां सिखाई। हैमर थ्रो व डिस्कस में गुरदेव पांच बार लगातार चैंपियन रह चुका है। गुरुदेव को खेल के दम पर ही पुलिस में नौकरी मिल चुकी है।
बुजुर्ग पिता का जुनून देख दंग रहा गया था बेटा
गुरुदेव ने बताया कि पिता ने 2015 में खेल की ख्वाहिश जाहिर की थी। यह सुनकर एक बार वह भी चौक गया। 67 की उम्र और खेल। लेकिन पिता का जुनून देखकर यकीन था कि वह बड़ी उपलब्धि हासिल करेंगे। इसके बाद उन्होंने मेडल जीतकर खुद को साबित भी किया। मुलतान सिंह राष्ट्रीय स्तर पर हैमर थ्रो में चार गोल्ड जीत चुके हैं। डिस्कस में तीन सिल्वर, एक गोल्ड और शॉटपुट में दो गोल्ड लेकर खुद को साबित किया। 70 प्लस के आयु वर्ग में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया। मलेशिया से हाल ही में वह दो ब्रांज लेकर लौटे हैं। गुरुदेव को पिता की उपलब्धि पर गर्व है।