अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर तीन दिवसीय स्वर्ण जयंती अंतर्राष्ट्रीय लवणता कॉन्फ्रेंस शुरू हुई। मुख्य अतिथि इंजीनियर वास्फी हसन एल श्रीलीन महासचिव अफ्रीकन एशियन ग्रामीण विकास संगठन ने इसकी शुरुआत की। उन्होंने कहा खाद्य सुरक्षा एवं पर्यावरणीय टिकाऊपन के लिए शुद्ध जल की कमी होना गंभीर खतरा है। विकासशील अफ्रीकन और एशियन देशों में मृदा एवं जल की गुणवत्ता कम होती जा रही है। लवणीकरण से उपजाऊ भूमि और जल की सुरक्षा हेतु जलवायु परिवर्तन के कारण हमें पहले से अधिक प्रयास करने होंगे। शोध वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वह वैश्विक कृषि को नुकसान से बचाने और लवणता के टिकाऊ प्रबंधन हेतु आपस में सहयोग कर अनुसंधान करें।
इससे पहले अंतरराष्ट्रीय कृषि विज्ञान अनुसंधान केंद्र जापान के अध्यक्ष व विशिष्ट अतिथि डॉ. मासास इवांगा ने कहा कि एशिया पेसिफिक क्षेत्रों में जीवन यापन सुरक्षा के लिए लवणता बहुत बड़ा खतरा है। कुछ वर्षों में समुद्रतटीय मृदाओं में समुद्री जल के आने से समस्या बढ़ रही है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां जलवायु परिवर्तन अधिक होते हैं। सुनामी के कारण बाढ़ आ जाती है। अंतर्राष्ट्रीय जैव लवणता कृषि केंद्र दुबई के महानिदेशक डॉ. इस्महाने एलोफी ने कहा कि 2019 तक वैश्विक मृदा लवणता मानचित्र बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे लवणता वाले क्षेत्रों के गरीब किसानों की गरीबी दूर करने में मदद मिलेगी।
मृदा सुधार से 1.8 गुना बढ़ जाती है आमदनी : डॉ. एसके चौधरी
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक डॉ. एसके चौधरी ने कहा कि लवणग्रस्त मृदा के सुधार पर किए गए खर्च से किसानों की आमदनी 1.8 गुना बढ़ जाती है। जोकि दूसरी समस्याग्रस्त मृदाओं के सुधार पर किए गए खर्च की तुलना में बहुत अधिक है। भारतीय मृदा लवणता एवं जल गुणवत्ता सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. प्रबोध चंद्र शर्मा ने संस्थान द्वारा विकसित विभिन्न प्रौद्योगिकियों की जानकारी दी। प्रौद्योगिकियों में अब तक 2.14 मिलियन हेक्टेयर मृदाओं का सुधार कर दिया गया है। इस अवसर पर डॉ. त्रिलोचन महापात्रा, सचिव डेयर व महानिदेशक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली, डॉ. मासास इवांगा, अध्यक्ष जिरकास व इस्महाने एलोफी, महानिदेशक (आईसीबीए) को सोसायटी की मानद फैलोशिप से सम्मानित किया गया। इस अवसर कुछ प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया। कॉन्फ्रेंस में 17 देश, सीजीएआईआरके संस्थान, राज्य विश्वविद्यालयों के 275 प्रतिनिधि वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। सहसंयोजक सचिव डॉ. आरके यादव ने धन्यवाद प्रस्ताव पेश किया।