मिलीभगत : लीज एग्रीमेंट खत्म, दुकानें वापस लेने की बजाए 21 साल बाद काट दी लीज की रसीदें
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल।
नगर निगम में राजस्व को घाटा पहुंचाने के मामलों के बाद अब स्टाफ की मिलीभगत का मामला सामने आया है। नियमों के खिलाफ जाकर पांच दुकानदारों की एग्रीमेंट खत्म होने के 21 साल बाद निगम के स्टाफ द्वारा लीज मनी और ट्रांसफर फीस लेकर जी-8 की रसीदें काट दी गई।
खास बात यह है कि काटी गई रसीदों का रिकार्ड न तो डिमांड और कलेक्शन रजिस्टर में मिला और न ही इससे संबंधित रिकार्ड ऑडिट डायरेक्टर के सामने पेश किया गया। जब लीज मनी का डिमांड रजिस्टर चेक किया गया तो ये पाया गया कि उन लोगों को कोई दुकान लीज पर नहीं दी हुई मिली, जिन लोगों के नाम जी-8 रसीद काटी गई। इसका सीधा सा मतलब है कि 21 साल बाद भी निगम द्वारा न तो अपनी दुकानें वापस ली गई और न ही उन दुकानों को दोबारा से दुकानदारों को लीज पर दिया गया। वर्ष-2013 और 2014 में अचानक इनकी रसीदें काट गई।
मामले के अनुसार शहर के पांच लोगों के पास निगम के पांच प्लाट थे। रिपोर्ट के अनुसार, इनकी लीज वर्ष 1991-92 में खत्म हो गई, लेकिन निगम द्वारा 21 साल तक इन प्लाटों को नहीं संभाला गया। इस बीच न तो निगम की ओर से दोबारा से लीज उन लोगों के नाम पर की गई और व ही फीस ली गई। अचानक साल 2013 और 14 में एकमुश्त राशि जमा करा ली गई।
ये मामला हरियाणा लोकल ऑडिट डायरेक्टर की ऑडिट टीम ने पकड़ लिया। साल 2015-16 की ऑडिट रिपोर्ट पर डायरेक्टर ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि इन दुकानों की रसीदें बिना किसी कंपीटेंट अथॉरिटी के आर्डर के लीज मनी लेना गैर कानूनी है। इस मामले की विभागीय जांच होनी चाहिए, ताकि पता चल सके कि कमेटी का कौन सा स्टाफ है, जिसने ये रसीदें जारी कर दी। इसके साथ ही डायरेक्टर ने रिपोर्ट में लिखा है कि दुकानें खाली कराने को लेकर एक्शन लिया जाए, चाहे इसके लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े, क्योंकि दुकानों पर लीज खत्म होने के बाद कब्जे गैरकानूनी हैं।
इन पांच लोगों के नाम पर काटी गई रसीदें
आडिट रिपोर्ट के अनुसार 27 मार्च, 2013 को एक ही दिन में दो रसीदें 40 और 41 नंबर काटी गई। इसके एक साल के बाद 31 मार्च 2014 को चार रसीदें नंबर 42, 43, 44, 45 काटी गई। जिन लोगों के नाम रसीद काटी गई, उनके नाम विजय कुमार, कैलाश रानी, श्याम सुंदर, विजय, सुंदर लाल के नाम शामिल हैं। रसीद काटने के इस खेल में अहम बात ये है कि रसीदों के नंबर सीरियल वाइज हैं, जबकि एक साल का अंतर है। इससे भी मिलीभगत की आशंका बढ़ जाती है।
न जमीन खाली कराई और न ही लीज मनी
इसी प्रकार का एक दूसरा मामला और है। निगम द्वारा कुंजपुरा रोड पर कई लोगों को प्लाट लीज पर दिये थे, जिन्होंने दुकानें बना ली। रिपोर्ट के अनुसार, इनकी 1991-92 में खत्म हो गई थी। लेकिन निगम द्वारा न तो लीज बढ़ाई गई और न ही जमीन और दुकानें खाली गई। लीज मनी भी नहीं ली गई, कोई डिमांड भी नहीं दी गई। जिसकी वजह से निगम को भारी घाटा हुआ। आडिट टीम ने इस मामले में निगम प्रबंध को मामले की जांच की सलाह दी है, साथ ही रिकवरी के लिए भी कहा। साथ ही ये भी कहा कि इन प्लाटों को लेने के लिए निगम को कोर्ट में इनके खिलाफ खाली कराने की प्रोसेडिंग शुरू करनी चाहिए। इनमें बता दें कि कुंजपुरा रोड शहर का मुख्य व्यावसायिक क्षेत्र है और पर भूमि के रेट लाखों रुपये हैं। इसलिए निगम को भारी घाटा हुआ है।
पूरा केस स्टडी करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। दुकानों के कुछ मामले अदालत में चल रहे हैं। इसलिए बिना फाइल देखे कोई टिप्पणी नहीं की जाएगी। अगर स्टाफ के किसी सदस्य ने गलत कार्य किया है, उसकी जांच कराई के बाद कार्रवाई की जाएगी। -धीरज कुमार, कार्यकारी अधिकारी, नगर निगम।